*अपच रस्म
एक दिन जाने कौनसी दुनिया से आती हैं
बेटियां बन दिल जनियाँ ।
आते हैं जैसे सब पर उल्लास का चरम कुछ अलग ही खिला-खिलाती ही जियरा ।।
पलती हैं नाज़ो धरम में महका के आंगन फुलवारियां ।
उमर बाली लड़कपन कौमार्य जाने कैसे गुजरता दे मन-वारियां ।।
देखते ही देखते उमर शादी की हो आती है पता ही नहीं चलता।
वक्त की रफ्तार में सापेक्ष जाने ये सब कैसे गुजरता ।।
सांसारिक रस्म निभाना हर पिता-मां- भाई की इक मझबूरी ।
मगर हक़ीक़त यही की ये रिवाज़ कोई दंपति नहीं चाहता ।।
शादी बेटी की घर उसके हमराज का मगर । परायापन उसका जननी- -जनक को सालता ।।
दुनिया का दस्तूर यही जिसने भी बनाया ।
निर्मम दिल पर पत्थर रख होता है निभाना ।।
कोई तोड़ नहीं इस रस्मे बेवफ़ा सांसारिकता का ।
क्योंकि हर पिता लाया ब्याह कर बिटिया किसी दम्पप्ति की अपना रिवाज दुनिया का ।।
बस चाह यही हर मात-पिता की कि सुख बना रहे श्रृंगार ओर गहना बिटिया का ।
पराई हो के भी अनवरत (मुसलसर) राज रहता जमाई -बिटिया का ।।
*nk सनातन