**क्या भौतिकता मातृत्व से ऊपर है ?**
( महिलाद्रोही या हितैषी मंथन! एक कवयित्री की ही दलील ओर विमर्श को विस्तार देती मेरी कलम 40 की उम्र यानी मातृत्व कर्म से निबटने के बाद ही नोकरी हो महिलाओं की देश और शिशु हित में…!)
नोट: जो महिलाएं अपने बच्चों से यशोदा मैया जैसा ममत्व रखती हैं अपने बच्चे के बचपन के साथ न्याय करती हैं। बचपन लगभग 6 साल तक महाविज्ञान विशेसज्ञ अनुसार क्योकि राजकीय स्कूलों में 5 वर्ष बाद ही प्रवेश ओर कच्ची पहली फिर पक्की पहली लेकिन शिक्षा के निजीकरण ओर कुकुरमुत्ते नुमा स्कूलों ने व्यवसाय की आंधी में उस पेशे को नापाक कर दिया है उन्होने पालनगृह प्रि नर्सरी नर्सरी मांटेसरी जैसी व्यवस्था दे उन मासूमो के बचपन को मार दिया है और अभिभावक भी इस तर्ज को नही समझ पिछलग्गू हो गए है और वो भी उस अबौध के साथ खिलवाड़ या अन्याय कर रहे हैं काश उनके अंतरमन को समझा सुना होता या सुनते…)
महिला सशक्तिकरण स्वतंत्रत भारत मे अब चरम पर है..….!
महिलाओं की देश मे पुरुषों के बराबर अधिकार… फिर महिला कोटा आरक्षण… उम्र में भारी छूट…
फिर विधवा .. परित्यक्ता ….को विशेष कोटे से राजकीय नोकरी..
फिर नोकरिपेशा महिलाओं को समान मातृत्व अवकाश मय वेतन…
दहेज विरुद्ध कानून बालविवाह विरुद्ध कानून..
निशुल्क शिक्षा ..किसी भी तरह की प्रताड़ना विरूद्ध संवरक्षण क़ानून…..
इस प्रकार देश मे समानता में महिलाएं सशक्त हो रही हैं और यू कहे कि दकियानूसी पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ सरकारे न्याय कर रही हैं..
खेर लेकिन इस स्थापत्य लोकतांत्रिक प्रकुति से कुछ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुष्परिणाम उभरे हैं जिसे विद्वानों, आलोचकों ओर विचारकों द्वारा अक्सर इंगित किया जाता है लेकिन फोहरे रूप में …. क्योकि इससे आपको महिला विरोधी मांन लिया जाय लेकिन ऐसा नही किसी विषयवस्तु पर दलील ,चर्चा ,मंथन स्वतंत्रता का अधिकार है जिसमे भली ओर शुद्ध सोच हो ….
बात ये काबिल ऐ गौर ये है कि आज मातृत्व खो रहा है …. नोकरिपेशा महिलाएं अपने शिशुओं के साथ न्याय कर पा रही हैं सोच का विषय है…
एक मजदूर महिला को मातृत्व अवकाश नही मिलता क्योकि वह देश की नागरिक तो है लेकिन राजकीय महकमे में नही ….ऐसी महिलाओं के बारे में आज तक किसी ने नही सोचा….
वो मजदूर महिला झांसी की रानी की तरह मजबूत हौसले ओर जज्बे की है…
पहले पहल तो वो बच्चा जनने के बाद ही खड़ी हो जाती है ठीक शेरनियों ओर हथिनियों की तरह …
उसे पता है यदि वो 6 माह विश्राम करेगी तो उसका घर उसका शिशु कैसे पलेगा फिर उसका खसम भी बेचारा मजदूर ओर मजदूरी से ही दैनिक जरूरते पूरी होती हैं म मजदूर फक्कड़ होता है… वो कभी कल पर नही जीता इसलिए उसकी जरूरते न्यून ओर यू कहे कि जो अति आवश्यक है बस.… कल की कल देखि जाएगी….
*मेरा चिंतन की प्रत्येक भारतीय महिला को मातृत्व भत्ता ओर अवकाश मिलना चाहे जैसे मजदूर है किसान है कामकाजी है गृहिणी है को सरकार विशेष कोटे से इतना गुजारा भत्ता दे कि माँ सपने शिशु के शैशव काल से न्याय कर सके और पुरुष भी अपने पितृत्व को बाट सके अपने शिशु के साथ….
अगर ऐसा होता है तो पूर्ण महिला सशक्तिकरण के पैरोकारों को सन्तुष्टि होगी…
* अब सवाल ये की क्या दुष्परिणाम उभरे हैं विशेष कर महिला नोकरिपेशा संस्कृति से…
मोटे तौर पर यदि नकारात्मक न माने तो सकारात्मक ही कि
महिला को राजकीय, सह राजकीय ओर राजकीय विभागों में नियुक्त करना न्याय संगत है क्या देश मे पुरूष पर्याप्त नही की महिलाओं को काम करना जरुरी है सुनते हैं पुरूष कभी शौक से नोकरी करते नही देखा… इससे इतर ….. 90% महिलाएं शौकिया नोकरी करती हैं या घर बोर होती है …ये अपने घर की अतिरिक्त और भोतिक विलास की वृद्धि हेतु भी नोकरी करती है।
नोकरी से देश को वित्तीय नुकसान है…. एक नोकरिपेशा महिला अपने 45 साल के जीवन मे यदि 4 बच्चे पैदा करे( हालांकि सरकार ने कानून बनाया था कि 2 से अधिक बच्चे तो नोकरी नही प्रोमोशन नही चुनाव टिकिट नही अगेरह -वगेरह)
तो जाहिर है 6 माह का वेतन महिला पेठे ,पुरुष को भी 3 माह पितृत्व अवकाश यानी पिता या माँ इस अरसे में आया से या पालना गृह में अपने बच्चे का लालन पालन करवाये तो किसे खबर ओर कोई पुख्ता कानून नही..
ऐसे में कई माताएं जो मॉडर्न संस्कृति की हैं भ्रामक विचार से त्रस्त की जवानी कम हो जाएगी फिगर कमतर हो जाएगा फीडिंग यानी शिशु को बोटल का दूध ही पिलाती है खुद कभी झूले नही आया नोकरानी से झुलवाती है कभी नन्हे को लोरी नही सुनाती ओर उसका सुसु -पोटी भी नोकरानी या आया ही साफ करती है .. ऐसे में क्या मातृत्व अवकाश न्यायसंगत है…!
नही.. तो फिर 9 माहो का अवकाश …लाज़मी है??
क्या महिलाओं का नोकरी करना अपरिहार्य है . क्या ये एक बेरोजगारी बढ़ने का कारक नही??
कहते हैं माँ प्रथम ओर प्रमुख शिक्षक होती है उसका शिक्षित होना आवश्यक है नोकरी करना जरूरी नही…
*ओर यदि महिलाएं नोकरी ही करना ही चाहती हैं तो वो देवीक मातृत्व से निपटने के बाद ही by bond की वह अब मातृत्व नही धारण करेंगी या फिर 40 की वय के बाद जिसमे मातृत्व धारण करने की इजाजत नही होगी।
* हमने पाश्चत्य संस्कृति को अपना आदर्श मान लिया है और हमारी समृद्ध संस्कृति संस्कार के मूल्य गौण हो गए हैं
आज कोई बताए ये देश की संस्कृति कहा जा रही हैं
गृहिणी एक समृद्ध और दैविक शब्द है और अंग्रेजी का शब्द हाउस होल्ड household किसी सूरत में भारतीय संस्कृति की मिसाल से न्याय नही कर सकता…
पहले प्रत्येक भारतिय स्त्री के नाम के पीछे देवी लगता था लेकिन अब नही ये संस्कृति के साथ खिलवाड़ है..
भारतीय सन्नारी परिधान साड़ी
अब पहनावे का हिस्सा कम होती जा रही है सलवार लेगी शोभित हो चली है…
* मेरे इस चिंतन का सार क्या है वो ये की —
शिक्षा का मतलब ओर उद्देश्य नोकरी नही सिर्फ और सिर्फ काबिल होना यानी एक सुसंस्कृत ओर जिम्मेदार नागरिक बनना लेकिन आज शिक्षा सिर्फ और सिर्फ नोकरी प्राप्त हेतु ही लेने का रिवाज़ है । सभी मानो यानी जब देश मे 100 प्रतिशत शिक्षा या शिक्षित हो ओर सब नोकरी ही चाहेंगे तो फिर क्या होगा क्या हम विदेश से बुलाएंगे कर्मी व्यापारी मजदूर ओर क्या हम उन्हें इतना pay कर पाएंगे…
*मेरी दलील ये की जब देश मे महिलाएं जॉब नही कर रही थी तब भी देश भोतिक रूप से संपन्न था और सांस्कृतिक रूप से भी। ओर बच्चों को माँ बाप का दुलार ओर देश नैतिक रूप से संपन्न था।
मैं चाहता ही स्वयं महिलाएं आगे आये अपने मातृत्व को भौतिकता से ऊपर रखे और गृहस्थी पद की गरिमा को उत्कृष्ट करे।
* इक ओर बिन्दु पर वो ये की प्राकुतिक रूप से महिला और पुरूष की शरीरिक बनावट ईश्वर ने अलग अलग बनाई जिसके पीछे कोई न कोई तो कारण तो अवश्य रहा होगा
विशेष रूप से माँ के पद को इतना महामंडित किया जाता है तो सिर्फ उसकी ममता त्याग संस्कार सहनशक्ति वात्सल्य
जहां उसकी सारी महत्वकक्षाये गौण हो जाती है वह अपने बच्चों के लिए सम्पूर्ण हो देवी से भी ऊपर दर्जा पा जाती है
पश्चिम में देवी जैसा कोई दर्ज़ा नही रहा हां ग्रीक सभ्यता में जरूर लेकिन ममत्व को लेकर कोई बड़ा इतिहास नही
जबकि यहां शकुंतला सीता रेणुका कौसल्या देवकी यशोदा यशोधरा त्रिशला सुनीति कुंती गांधारी जैसी महान नारी परम्परा रही है…
यदि घर मे एक पुरूष ही कमाए तो घर चल ही सकता है वैसे भी सिर्फ 10% महिलाएं नोकरिपेशा हैं
ईश्वर ने नारीशक्ति की सिर्फ मातृत्व के दैविक सुकूँ के लिए पैदा किया है और उसी पावन कृत्य के कारण उसका महत्व गरिमा सर्वोच्च हो जाती है
यदि महिला बच्चा पैदा करने के बाद 5 वर्ष तक उसका लालन पालन नही करती है तो कह सकते हैं ये ईश्वर की इच्छा सत्ता के विरुद्ध है … अब सरोगेसी का भी युग कोई मां बनना नही चाहता किराए की कोख से जब बच्चे पैदा करेगी माये तो मातृत्व अवकाश क्या लाज़मी
निश्चित बात पैदा करने तक सीमित नही मूल शिशु का सही लालन पालन और यदि वह लड़ सकता ईश्वरीय अदालत में तो कहता मां मुझे तू चाहिए और पूरे 5 साल मैं तेरी गोद मे नेसर्गिक रूप से पलु बधू …।
*N K सेवक ” सनातन”