*चक्रम ओर मन्थन *
ये दुनिया कितनी ही खराब है या के बहुत बढ़िया लेकिन हकीकत तो यही है कि इस दुनिया को कोई भी प्राणी छोड़ना नहीं चाहता जो छोड़ते हैं (1 प्रतिशत आत्महत्या द्वारा) वो मजबूरन छोड़ते हैं और मजबूरी इच्छा नहीं होती ! और 99 फीसदी लोगों को दुनिया उस महान सर्वशक्तिमान के द्वारा ज़बरन जब-तब-कब किसी न किसी बहाने छुड़वाई जाती है। स्पष्ट है ये दुनिया किसी के बॉप की बपौती नही या जायदाद नही है।
*NK सनातन
बरसो हो गए मैं जिंदगी की जद्दोजहद ओर घर-गुजारे में ही खोया हूँ
खुद से अब मिलु ,तब मिलु बस सोच में ही रह गया हूँ
यानी बरसो से मैं भटकाव में हूँ
ओर ख़ुद होकर भी खुद से नहीं मिला
अब तलक मैं दुसरो के हिस्सों का जी रहा हूँ
कभी खुद का भी खुद के लिए जीऊ
इन्तजार है, तलाश है…!!!
*nk सनातन
कविता कवि द्वारा गाई जाती है लेकिन साहित्यिक भाषा मे इसे कवि समाज “पढ़ी” कहता जा है! हाँ देख कर एक विशेष लहज़े या एक व्याकरणीय शैली या अंदाज में अदा की गई कविता को -बोला यू कहा जाता है।
ओर बिन देखे कविता को विशेष गद्यात्मक लय में उड़ेला जाय उसे – प्रस्तुत किया कहा जाता है।
*nk सनातन
प्रजातंत्र में नागरिक की आज़ादी ओर अधिकारों को कर्तव्य के दायरे कम कर देते हैं या सीमित कर देते हैं !
*NK सनातन
प्रजातंत्र में आज़ादी को कर्तव्य के दायरे कम कर देते हैं या सीमित कर देते हैं !
*NK सनातन
पहले इत्र के व्योपारी इतने न थे शहर में
हर गली मोहल्ले बस फेरी ही फेरी वाले हैं
ऐसे में दूसरे शहर की टोह ली
अफ़सोस इत्र का हाल ऐ रोजगार वहां भी बदत्तर था!
*nk सनातन
इत्र का व्यापारी फेरी लगाता हूँ
गांव तो थे ही अफ़सोस अब-2
शहर में भी इत्र के खरीददार नहीं रहे
ऐसे में बेरोजगार हो गया हूँ
बस इत्र की महक से परिवार को सुलाता हूँ और खुद जगता हूँ
*nk सनातन