बस में कुछ भी नहीं!
जी है जिंदगी ऐ खुदा
जैसा तूने जिलाया है
हंसाया कम रुलाया है बहुत
जिलाया है तूने मेरे नसीब का
अच्छाइयाँ- बुराइयां साथ चलती हैं
जमाने की परिभाषा में तूलती हैं
कोसने वाले कोसते हैं जिंदगी चलती है
दारा-सिकन्दर बड़े -बड़े निकल गए
श्री राम-कृष्ण के आदर्श कमियां भी छोड़ गए
लेकिन वो महामानव पार पा गए
एक तुच्छ मानव पार पाए तो कैसे!
जिंदगी के इस पड़ाव पर निचोड़ यही
की बस में कुछ भी नही आदमी के
कब क्या ही जाय ध्यान से चलने वाला आदमी
दाएं बाए सामने पिछे देख कर चलने वाला आदमी
शाणा जेब मे हर दम दवाई रखने वाला आदमी
जाने ऊपर से नीचे से कब निबट जाए
कुल मिलाकर कहते सब हैं पर
सनातन’ बस में कुछ भी नही के आदमी !
*nk सनातन