” नशेमन जहां में हर कोई हैं
बस फर्क इतना है “सनातन”
वो हाला पी के
हम गम पी के
आप मद पीके
कोई रब पी के
कोई गरल पी के
इन सब पेयों में सोचता हूँ
गरल ही पी लू
शिव की तरह
आशुतोष बन जाऊं
अमृत को देवता क्या दानव
सब चाहते हैं
फिर बेचारे निरीह
अह इंसा का बोलो
क्या कुसूर है
आखिर सांसारिक
झंझावात ले जो बैठा है।।
Nk सनातन उदयपुर