विश्वास का घात- आगात
( On Kumar Vishwas ‘s comment in a poet summit in Udaipur )
श्री राम को नकारते हैं ; श्री कृष्ण को अपनाते हैं !
फिर संभलते तो कहते हैं ; श्रद्धा बहुत है श्रीराम में !
लेकिन श्रीकृष्ण अपने हैं,
आदर्श अगाते हैं !
वैसे श्रीकृष्ण सबके अनुरंजक जो प्रेम मे समाते हैं !
और नीति- कूटनीति दोनों को अपनाते हैं !
श्रीकृष्ण युग के सबसे सफलतम प्रेमी;
आप खुद को सबसे नाकाम बताते हैं !
राधा के अधूरे प्रेम में, जिन्होंने पूर्णता पाई !
कृष्ण ऐसे विरले प्रेम अनुयायी ,अनुरागी !
सिर्फ प्रेम पुजारी होने और कूटनीति के साए ;
श्रीकृष्ण को अपनाना ! ओर श्रीराम को सिर्फ श्रद्धा बताना !
हे कवि, हे चिंतक, हे लोक रंजक !
कई-अनेक सवाल खड़े करता है ;
क्षोभ, प्रतिरोध लेकर !
श्री राम आदर्श राजनीति के पर्याय ,
श्री कृष्ण परिस्थितियों वश ढलने का दोहराव !
हालांकि उत्तरों के बहसों-प्रश्नों के अपने प्रकार हैं ;
देव- दानव के अपने- अपने सिद्धान्त हैं !
देव -दानव को हमने, हमारी सोच ने बनाया है ;
परिस्थितिनुसार हमने उन्हें अपनी-अपनी तरह अपनाया है !
जो विषय-वस्तु देवों की नज़र में अनर्गल-असही;
निश्चित वही दानवों की दृष्टि में सही !
कुल मिलाकर ‘सनातन’ का यही प्रादर्श यही
संदेश ;
राजनीति में हो सुनीति,
आदर्श श्रेष्ठ ;
व्यक्तिगत जीवन शून्य परोपकारी विशेष!
चाणक्य सा हो सादा-सरल जीवन ;
लोग कहें हमें, वाकई है विशेष !!
*NK सनातन