साधु या धर्मगुरुओ की आवश्यकता
साधु की आवश्यकता
( सन्त-साधु, यति, तपस्वी, मौलाना , मोलवी, उलेमा, पॉप-पादरी ,ज्ञानी ,मुनि, योगी, भिक्षु , पेगोडा ,दलाईलामा की आवश्यकता क्यों और किसको ? )
सर्वप्रथम मैं उपर्युक्त विषय पर चर्चा करू इससे पहले स्पष्ट कर दु की वर्तमान समय मे कथा वाचक ,योग गुरु सन्त का दर्जा पा गए क्योकि कुछ ने गेहुँए वस्त्र और लंबे बाल , लम्बी दाढ़ी -मुछ , गल रुद्राक्ष-तुलसी माला -तिलक आदि धारण कर ली ओर लोगो मे इस रूप की छवि या जो धारणा थी सन्त मान लिए गए क्योकि की देश और दुनिया मे अंधता ओर अज्ञानियों की एक बड़ी जमात है… हालांकि कुछ कथावाचको ने स्पष्ट किया कि वह सिर्फ कथाकार है….. सन्त नहीँ…।
हाँ अब मैं मूल विषय पर जिक्रे सवालात पर आता हूं…….की
दुनिया मे कई धर्म हैं और कई धर्मावलंबी हैं धर्मो में कुछ मत हैं, मतान्तर हैं।
सब धर्मों में धर्मगुरू हैं बस नाम अलग -अलग हैं । आखिर सवाल ये की इन धर्मगुरुओं का क्या काम है ? और इनकी आवश्यकता किसको है… ओर क्यो हैं ?
हाँ इसका सबसे सटीक और उत्तम उत्तर ये है कि सभी धर्मों के धर्म ग्रंथ, महाग्रंथ क्लिष्ट भाषा मे वर्णित ओर उल्लिखित हैं।
ओर एक आम आदमी इसे नही पढ़ सकता….. समझ सकता… ओर धर्मगुरु विशेषरूप से इन्ही ग्रंधो को धर्म की पाठशाला में उस भाषा मे पारंगतत हो पूरी तरह से समझते हैं और अकादमिक शिक्षा और अनन्य ज्ञान अपने विशेष गुरुओ से प्राप्त करते हैं और फिर ईश्वर से योग ,तप,साधना,मनन, इल्म आदि माध्यमों से प्राप्त कर अज्ञानी लोगो को धर्मसभाओं में अपने प्रवचन, आख्यान ओर उपदेश के द्वारा सभा मे प्रस्तुत करते हैं। सवाल ये की सभा मे अशांत मन- चित ,शारिरिक व्याधि , पाखण्ड, ढकोसले , कमझोर हृदय और कुछ पापी, कुछ लालची जो आशीर्वाद पाना चाहते हैं, समस्याओं का हल चाहते हैं ऐसे लोग आते हैं उन्हें भक्त कहना उचित नही क्योकि वह स्वार्थमय वहाँ पहुंचते हैं। कुछ अकादमिक डिग्रीधारी लोग भी पहुंचते हैं। वे ज्ञानी हैं लेकिन संसार मे कोई पूर्ण नहीँ ओर ज्ञान के लिए निरंतर पढ़ना पड़ता है ऐसे में धर्मसभाओं में सीधा मात्र श्रवण से ही ज्ञानार्जन हो जाता है। हाँ लेकिन किसने स्वयम दर्शनशास्त्र पढ़ा है, मनोवैज्ञान पढ़ा है और अपने स्तर पर धर्मग्रंथो ( अपने धर्मग्रंथों के अलावा ) उसे किसी धर्मगुरु के पास जाने की जरूरत नही बल्कि वह खुद ऐसी स्तिथि में है कि अज्ञानी लोगों को ज्ञान परोस सकता है , बांट सकता है लेकिन भक्त सिर्फ लबादे वाले गुरुओ में ही विश्वास करते हैं यानी कि जिन धर्मो के धर्मगुरुओं की पोशाके या वस्त्र निश्चित हैं वो धारण करो फिर पाखण्ड के लिए लंबी ढाढ़ी लम्बे बाल ,हाथ मे कमण्डल, मोर पीछी , चिमटा , मुल्ला अरेबियन ढाढ़ी, अरबी काबाई टोपी, गाउन वाला लबादा, सर पड़ वेटिकन पोप टोपी ,पगड़ी-दाढ़ी आदि।
अब आधुनिक युग मे जब शिक्षा- संस्कृति का विकास चरम पर है और संचार क्रांति के प्रसारण से ज्ञान खास नहीं होकर आम हो गया है अतएव धर्मगुरुओं की महत्ता इतनी नहीं रह गयी है फिर भी मानसिक रूप से बीमार ओर कुछ अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए उन धर्मं गुरुओं की चाटूकारिता ओर चकोरी करते हैं। जैसे एक आम आदमी बोलेगा की–” सदैव प्रसन रहो !” भक्त जन मंत्रमुग्ध हो जय-जय कार करेंगे।
मैं अगर पुछु एक सवाल तो सारा उपदेश धारा का धारा रह जाय।
मैं पुछु –गुरु वर 12 घण्टे कड़ी मेहनत करनी पड़गी है ऐसे में प्रसन्नता कही घूम हो जाती है। आपका क्या …आपको तो सब विरासत में मिला है…. ओर अगर नही भी मिले तो भक्त खूब दान देते हैं आपको सिर्फ बोलना है भगवा वस्त्र धारण कर …छापा -तिलक लगाना है और चाकर-सेवक-भक्त सेवा करते हैं आपकी क्योकि उनकी रोजी आपसे खूब चल रही हैं… बस समय पड़ पंडाल में सजी शानदार ड्योढ़ी या सिंघासन सजा है… आपको कुछ नही करना पड़ता आयोजक मेहरबान हैं .. आपका नाम है।
राम-रहीम …राधेमा,आशाराम,उसका बेटा,निर्मल बाबा, रामपाल, सत साई बाबा अरबो के स्वामी… कोई इनकम टेक्स नही।
श्रीश्री 1008 रविशंकर …. कितने करोड़ दिए … कई लोग डोनेशन के दाम NGO के माध्यम से उद्योगपति बन गए ,महा मण्डलेश्वर बन गए।
यदि बिना शारीरिक श्रम के प्रसन्न रहा जा सकता है । कहने को हम भी कह दे–
सदैव प्रसन्न रहे
स्वस्थ रहे
आराम हराम है
अतएव सार यही है मेरी तकरीर या दलील की यदि आप धर्म का ज्ञान चाहते हैं निश्चित गुरुओ,धर्मगुरुओं की शरणस्थली पर जाना चाहिये। यदि आप समस्त सांसारिक बन्धनो से मुक्ति चाहते है तो एक मात्र श्रेष्ठ ओर सरल युक्ति हैं– मृत्यु वरण ! दूसरा विकल्प सन्यास, तीसरा वानप्रस्थ । दूसरी दो दशाओ में सांसारिक आवश्यकताये ,भौतिक आवश्यकताए क्षीण कम पड़ जाएगी लेकिन कुछ शारीरिक जरूरते जिससे भूख-प्यास तो रहेगी ,फिर जब शरीर है मन है साथ तो क्षुधाये भी रहेंगी और व्याधियां भी रहेंगी क्योकि उदर है और तन है तो प्राकुतिक रूप में भौतिक जरूरतों के लिए आपको भोजन,पानी जुटाना पड़ेगा और वो अपने आप आएगा नही ओर यदि आप जंगल मे अपना आसमाल ले गए तो प्रत्यक्ष और परोक्ष दुविधाएं ,चिंताएं इर्द-गिर्द रहेगी। कुल मिलाकर जीवन रहते जीवन की आवश्यकताये न्यून हो सकती हैं नगण्य नहीँ।
हम सब किसी न किसी धर्म के अनुयायी हैं और जो ये दावा करते हैं कि नास्तिक हैं भी अप्रत्यक्ष रूप से आस्तिक हैं क्योंकि ईश्वर के न्याय और व्यवस्था पर वो आशंकित ओर डरे हुवे हैं यानी वो ईश्वर है तो साक्षात देखना चाहते हैं । जो प्रत्यक्ष आस्तिक हैं लेकिन आस्था के नाम स्वार्थी हैं क्योंकि उन्हें सुखी जीवन चाहिए। जिन्हें सुखी जीवन नहीँ चाहिए मुक्ति चाहिए ,ईश्वर के चरणों या स्वर्ग में स्थान चाहिए एक स्वार्थ के छद्म रूप है । तो बात साधु-संत या धर्मगुरुओं की आवश्यकता क्यों ….वो बस इसीलिए की —
बिना पढ़े सिर्फ श्रवण से ज्ञानार्जन जो ; दूसरा यह कि जटिल भाषावलि में छपे या उपलब्ध ग्रंथो को धर्मगुरू भलीभांति समझा सकते हैं । तीसरा ये की ज्ञानी हैं वो ज्ञानवर्धक कर पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं । आधुनिक युग मे सन्तो के रंग बदले हैं और जो त्याग , तपस्या की जगह ऐश्वर्य ने ले ली हैं और यही बात संत को सन्त परम्परा से विलग करती है लेकिन आधुनिक युग मे कोई परम् ज्ञानी, तपस्वी है और साधारण जीवन शैली वाला साधु है तो उसके भक्त शून्य होंगे क्योंकि लोग दिखावे ओर विलासिता को स्थान देते हैं, पसंद करते हैं। अंधतम भक्त तभी बनते हैं जब आपके पास अनन्य ज्ञान के साथ साधन-सम्पन्नता हो । यामी पाखण्ड, ढकोसले, चोचले ओर भौतिक चमत्कार यानी झूठ सत्यता से कहने का साहस हो। अन्तोगत्वा मैं यही कहूंगा चाहे कितना भी सुन लो मुनियों-संतो, पादरी,मौलाना, ज्ञनियो, पेगोडा, दलाईलामाओ,योगियो को सब के आख्यानों ,उपदेशों का सार सिर्फ और सिर्फ नैतिकता है जिसमे संसार के ज्ञात सभी गुण आ जाते हैं, यदि सरलतम शब्द में कहूँ तो अच्छाई बस अच्छाई । अच्छाई दैविक शब्द है और सम्पूर्ण स्वर्गलोक का प्रतिनिधित्व करता है……..इत्यलम ।
*nk sevak ” सनातन “