तल्खीयां पकी अधपकी

तल्खीयां पकी अधपकी

◆तल्खियाँ (पकी-अनपकी-“अधपकि) मोहब्बते अशआर में ★
शहर में कहाँ किसको फुर्सत है
जो भी मिलता है कहता व्यस्त बहुत है ।
वो कहते हैं हम दोस्त हैं तेरे
उधार-व्यवहार-आचार -विचार से परखा
अफ़सोस मुझे अभी भी दोस्तो की तलाश है
सच मे इस मायने दुनियावी आईना बड़ा खराब है !
वक्त की सुबह में अपना साया साथ था
लेकिन वक्त की शाम में वो मुझसे दूर था
यही वक्त का क्रूर-कड़वा चलन है
ये दुनियावी सच जो गुजरे उन्हें मालूम है ।
लोग कहते हैं बहुत व्यस्त हूँ मरने की भी फुर्सत नही
लेकिन फिर भी लोग मर रहे हैं
शहर में कुत्ते बहुत ज्यादा हो गए हैं नसबन्दी का दौर चल रहा है
प्रजनन काल का दौर वो सब पाक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं
लेकिन उन बेचारों को क्या मालूम ….
की कि उनकी पीढ़ी रुक गई हैं ।
गांव में अब तक कुत्तों की नसबंदी की जरूरत नही आन पड़ी है
सुना है गाँव के सब स्वान बड़े मजे में हैं ।
वो मिला चंद मिनिट बात की और निकल लिया कह कर की बहुत जरूरी काम है
फिर मैं गुजरा कुछ पलों बाद एक चौराहे पर
देखता हूँ बड़ी भीड़ थी वहां
माज़रा था-”एक पागल उलूल-जुलूल हरकते कर रहा था”
उस तमाशे में बतौर दर्शक मेरा वो दोस्त भी था जो कुछ समय पहले बड़े काम से व्यस्त ओर बहुत जल्दी में था !
वो लोगो को कोसता है शासन-अनुशासन पर
लगता है वो आदर्श -नैतिकता की मूरत है
जरा गिरेबान में झांके वो की वो कितना दुरस्त है
यानी निचोड़ यही की दुनिया दुरस्त हो या नही बस खुद तो दुरस्त हो ।
शहर में हर तरफ शतरंज की बिसात है
असल वजीर मर रहे हैं और
प्यादे वजीर बन रहे हैं
और अफसोस राजा मात खा रहे हैं ।
चौड़ी सड़को ने बेशक रफ्तार बढ़ा दी है
लेकिन हादसों की रफ़्तार में भी तो इज़ाफ़ा हुवा है
आलम ये है कि मोर्चरी ही एक जगह बचती है
जहां सिर्फ पोस्टमार्टम का इंतज़ार बचता है ।
एक पुराने शहर को स्मार्ट (अद्यतन) बनाने की मियाद तो दी है सरकार ने कॉन्ट्रैक्टर-इंजीनियर को
लेकिन अफ़सोस स्मार्ट लोग बनाने का ठेका नही दिया अब तक किसी को !
आजकल सर्कस- जोकर पटल से गायब हो गए हैं
क्योंकि हर व्यक्ति दुनियावी सर्कस में एक अपालतु जानवर होकर खुद अजीब तरह का तनाशबीन हो गया है !
वार -तीज ,त्योहार वो स्मार्ट फोंन पर तरह- तरह के कई व्यंजन- मिष्ठान भेज रहे हैं
हकीकत में पहुचे उनकेँ घर तो सिर्फ एक चाय-नमकीन में निबटाया !
शहर तो शहर गांव-ढाणियों में निर्जीव लोगो का हुजूम है
सोचता था शहर से गांव जाऊ दिली सुकु के लिए
सो सक्रिय रहा घर मे ही मोबाईल का संसार लिए ।
वादे -दावे आपने बहुत किये
चुनावी मिशन में खूब गिनाए हुंकारा भरवा के
सभा से इतर जागती आंखों से उन्होंने गिना तो सब उपलब्धियां शुन्यतम निकली !!
nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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