नकली ठहाके

नकली ठहाके

व्यवसाइक दौर में सच्ची हंसी बाजार से गायब है
तनख्वाह बड़ी,रुतबे बड़े व्यापार में आमदनी अच्छी
लेकिन सच्ची अच्छी हंसी की कमी
सोचता है “सनातन” की
सच्ची हंसी की इक दुकान खोल लूं
तब सवेरे सवेरे हा हा हा हा करने वाले
और झूठी हंसी को योग से जोड़ने वाले
शायद समझे की यूं हंसाना बेकार है
लाखो लोगो की असली हंसी गायब है
आप को ईश्वर ने बहुत दिया है
उस आसमांल से आप बहोतो को हंसी दे सकते हैं
निकली हंसी आप दे भी किसे रहे है
जिनके पास हंसी के खास साधन है
पर वो जाने हंसना हंसाना क्यों भुल गये हैं
इसलिए की वो सिर्फ अपना जीना चाहते है
और अपना जीना असल दर्शन में जीना नही है
निचोड़ ये की हंसी आप उन्हें दे
हां जिन्हे जरूरत है हंसी की
धन असबाब रोजगार दे आप हंसी दे सकते हैं
और ईश्वर ने आपको बहुत दे रखा है
चाहे असल में तो आप हजारों को हंसी दे सकते है
नकली हंसी इक तरह का अभिनय
और अभिनय असल नही नकल ही होता है
और नकल से कोई फायदा असल में कभी होता ही नही….
*Nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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