सरकारी नोकरी में स्थायित्व खतरनाक!

सरकारी नोकरी में स्थायित्व खतरनाक!

सरकारी नोकरी में स्थायित्व खतरनाक है!
राजनीति में अस्थायित्व खतरनाक है!
पिछले 20 सालों में महंगाई 11 % बढ़ी है और वेतन 22 % !!
■ जबसे 3रा 4था वेतन कम्मिशन क्या लागू हुवा राजकीय महकमे में भारत का हर पढा लिखा काबिल- नाकाबिल व्यक्ति राजकीय विभाग में नोकरी चाहता है ,इसकी दो मोटी वजह हैं–
पहला ये की मोटा -गाढ़ा वेतन
दूसरा स्थायित्व यानी परमानेंट नोकरी
लोन ओर अन्य प्रत्यक्ष- परोक्ष सुविधाएं
ओर सबसे खास 30 साल/60 वर्ष की नोकरी के पश्च पेंशन खुद को यदि जिंदा हैं नही हैं तो पत्नी को….शुक्र है बच्चों को पेन्शन देने का रिवाज सरकार ने नहीं रखा है!
ओर दार्शनिक ओर मनोवैज्ञानिक रीति की बात करे तो उपरोक्त कारण है जो इन कर्मचारियों को ईमानदारी से भटकने के कारक बनते हैं। ईमानदारी का तात्पर्य काम,व्यवहार,सहयोग, समर्पण से लेकर घुस नही लेना ,ग्राहक को परेशान नहीं करना और समय की पाबद्धता रखते हुवे त्याग,निष्ठा,तत्तपरता ओर समर्पण से अपनी सेवा दे।
लेकिन हम देखते हैं कि 90 प्रतिशत कर्मचारी सेवा के इन आदर्शो से दूर है या उन्हे ये सब बातें ओछी ओर गौण लगती हैं। आलम ये है कि दिन जैसे तैसे पूरा करना या मंद गति से काम करना, क्लाइंट को चक्कर लगवाना आदि । ओर सबसे खास महीना जैसे तैसे पूरा हो ओर वेतन उठाना। जिनके ऊपर की कमाई है या फिर फ़ाइल पर वजन रखवाने की सुनीति चला रखी है तनख्वाह की आवश्यकता ही नही पड़ती । आये दिन मोटी ओर छोटी तनख्वाह वाले कर्मचारी घुस, आय से अधिक अकूत संपत्ति के आरोप में धरे ओर पकड़े जा रहे हैं और आगे हमारा महान कानून उन्हें रियायत देने ,बचाने तैयार खड़ा है जहां कर्मचारी, महकमे सब बिकते हैं और फैसला होने तक सस्पेंशन में भी आधा वेतन उठाएंगे ……! घुस इसलिए लेते हैं कर्मचारी की आगे की लड़ी में उन्हें बचाने वाले खड़े हैं वही प्यारी घुस लेकर…!
तो फिर फिर सोच का विषय की क्या हल ढूंढा जाय… ? मेरी सोच और मंथन में यही लगा कि उपरोक्त जो बिंदु इंगित किये उन पर गौर किया जाय और किसी भी कर्मचारी को स्थायी नहीं किया जाय और हर कर्मचारी के लिए शिकायत का खुला मंच हो,सार्वजनिक जगह-जगह शिकायत बॉक्स हो और सीधे पोस्ट से भी भेजने की व्यवस्था हो। शिकायतों पर सटीक जांच हो और गलत शिकायत करता अगर हो तो उसे राजकीय दंड मीले ओर यदि कर्मचारी दोषी है तो उसे नोकरी से वंचित कर सज़ा दी जाये। जब नोकरी का स्थायित्व नही रहेगा तो कर्मचारी वर्ग ईमानदारी निभाएगा ही। निजी संस्थानों में स्थायित्व नही है इसीलिए काम पूरी तन्मयता ओर ईमानदार से निभाया जाता है ,वहां बेवजह किसी कर्मचारीयों को हैरान-परेशान नही किया जाता। हाँ कुछ अपवाद जरूर हैं कि बॉस अपने निजी स्वार्थों, अपने चहितो द्वारा जलन-ईर्ष्या वश भटकाते हैं और बेचारा ईमानदार व्यक्ति भुगतता है। चाटूकारिता एक बहुत बड़ा गुण है लेकिन कई प्रबंधक, मालिक , प्रशासक पूरे तथ्य जानकर ही उचित निर्णय लेते हैं।
तो निष्कर्ष यदि देश मे ईमानदारी ओर अच्छी सेवा चाहिए तो राजकीय विभागों में औसत वेतन हो, काम की गुणवत्ता,योग्यतानुसार हो, और स्थायित्व बिल्कुल न हो,न ही पेंशन हो।
*nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

Leave a Comment

Keep reading

You may also like