एक क्रांतिकारी-बलवाई विचार

एक क्रांतिकारी-बलवाई विचार

हिंदू रीति- नीति में मुहुर्त , कुंडली एक स्वनिमंत्रित बाधा- अड़चन लिए अपने अतार्किक – अंधविश्वासी असुर
ना इस दुनिया मे आने का कोई मुहुर्त है न इस दुनिया से जाने का ……. फिर ये मुहुर्त का चक्कर क्यो चलाया । बड़ी सोची समझी चाल से सभ्रांत देव भाषा और देवो का ज़िक्र अपने तरीके से कर तथाकथित वर्ण व्यवस्था के श्रेष्ठ जन ने निरीह अज्ञानी अपढ़ जनता को भ्रमित ,गुमराह ओर ईश्वर राहु केतु शनि देव के नाम भयभीत कर ऐता झकड़ा परम्परा के जाल में की आज आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षित समाज भी इसके काले साये में खड़ा पड़ा है। विशेष कर मैं जिक्र कर रहा हूं हिन्दू समाज जो आज भी इस रंग में रंगा डूबा सना पड़ा है। आख़िर ये मुहुर्त क्यो… हिंदुस्तान में दो कैलेंडर चलते हैं विक्रम एवं शक ओर इसके अनुसार कुछ आगा पीछा होता है। कैलेंडर किसने बनाया ? ये मुहूर्त प्रथा किसने चलाई ? क्यो चलाई ? क्या तार्किक रूप से ये सही ठहरती है। क्या जन्म और मरण का कोई मुहुर्त है। जो भी मरा हिन्दू नीति में स्वर्गवासी हुवा! चाहे किसी भी काल-अकाल में पैदा हुवा ! मैं एक हिंदू हूँ ऊपर से ब्राह्मण और पूजा-पाठ कर्म कांड शुभ अवसर विधि-सिद्धि हमारा पेशा रहा है लेक़िन मैं इस प्रकिया से क्षुब्ध हूं खिन्न हूं विचलित हूँ ! क्यो ? क्योकि इस रिवाज से कई प्रत्यक्ष-परोक्ष नुकसान अवलम्बित होते हैं। महज़ दो मित्रो का विवाह शुभ दिन एक ही दिन टकराते हैं ! दो भाइयो की बेटियों -बेटों का विवाह एक ही दिन ,एक ही घड़ी टकराता है ! ठीक यू ही निकटम रिश्ते -नाती की शादी का एक ही दिन मुहुर्त सम आता है। पँडित -पंचांग यह बताता है कि यदि इस सीन लग्न नहीं रखे तो 5 साल तक इस कन्या … इस पुत्र के लिए कोई मुहुर्त कोई धार्मिक योग नही ! या 6 माह… एक साल कोई अच्छा सुमेल विवाह योग नहीं ! आश्चर्य की इस झमेले में इस चक्कर मे निकटतम मित्र-रिश्तेदार- नाती एक दूजे के सुअवसर पर नही जा सकते । शहर में तो खैर औपचारिक रूप से 2-3 रिसेप्शन, शादी में जा सकते हैं लेकिन सुदूर या दूरस्त स्थान पर सिर्फ एक गई जगह जाना संभव होता है। ऐसे में मात्र मुहुर्त के नाम हम बहुत कुछ मिस करते हैं खोते हैं ! ये तार्किक रूप से सही नही है। मैंने देखा है एक कस्बे के नामचीन पंडित-ज्योतिष विद जो कस्बाई जनो के सारे मुहुर्त निकलता था … एक रोज़ स्कूटर से घर को दिन को निकला ओर घर से महज एक किलोमीटर पर उसका ऐक्सीडेंट हुवा ओर वो वही मर गया….! मुहुर्त निकालने वाले को ही मुहुर्त का पता नहीं था!
मेरा ये तर्क की दूसरे धर्मावलंबियों के धर्म में मुहर्त का कोई रिवाज नहीं। कोई भी दिन वो चुनते हैं और सफल जिंदगी जीते हैं। इधर हिन्दू पूरे मुहूर्त के बावजूद जीवन मे दुःख के हिस्से देखते हैं। तो मेरा दर्द , मेरा मर्म यही की मुहुर्त एक नॉनसेंस प्रथा है ,अतार्किक है ! कुंडली प्रथा निरर्थक है इससे कही सुमेल जोड़े जीवनसाथी बनने से वंचित हो जाते हैं। जिन जोड़ो ने प्रेम कर या पसंद कर आपस मे विवाह का तय किया उन्होने कुंडली बदल विवाह किया ओर सफ़लतन जीवन जी रहे हैं।
यानी निचोड़ यही मेरी इस तकरीर इस दलील का की इस पचड़े की दर्किनार करना चाहिए। जीवन मे सब तय है इसे रोका जाना संभव नही। यदि ये ग्रह विघ्न कारक है पूजा करवा दीजिए 10-20 हज़ारे की सारे ग्रह -नक्षत्र आपके हामी- हितेषी हो जाते हैं! ये क्या है ? एक तरफ हम कहते हैं –” होई है वही जो श्रीराम रची रखा…. तो फिर ये ढकोसले टोटके चोचले क्यो?
दिन वो तय हो शादी का की आप हमारे यहां आ सके और हम आपके वहां आ सकें बस। मुहूर्त नही मानने वाले भी जिंदा हैं ओर शान से जिंदा हैं।
*nk सेवक ”सनातन”

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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