बूढ़ापा

बूढ़ापा

लिखा बहुत होगा कइयों ने बूढ़ापे पर,
मैं क्या उनसे बेहतर लिख पाऊँगा,
लेकिन विषय मिला सो प्रयास कर बैठा,
बूढ़ापा आने से पहले ही बूढ़ापा समझ बैठा,
बूढ़ापा बोले तो – एक लाचारी है।
एक अभिशाप है। एक भुगतान है।
एक पछतावा है – सब ठीक है।

मगर बूढ़ापा – बचपन का पुनरागमन
कहना बेमानी है – तुम देखो – समझो,
बूढ़ापे में बूढ़ों से कौन प्यार करता है।
कौन लोरी सुनाता है, कौन गोद पास ले घूमता है।
कौन आपकी गलती माफ़ करता है?
आपकी उस तरह सेवा करता है कौन?

इसलिए मैं चुनौती देता हूँ,
महान वर्डज़वर्थ के चिर विवेचन को,
कुछ मायनों में सही मगर कई मामलों में,
बूढ़ापा बचपन का पुनरागमन नहीं होता।

कुल मिलाकर कहूं तो बूढ़ापा एक –
कमाई है, एक रुबाई है।
एक टीस भी एक भरपाई है।
एक बीमारी है, नर्क का अनुभव,
अंग्रेजी में कहे तो रिहर्सल।

— नरेश कुमार ^सनातन*

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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