~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का

ज़िंदगी का फ़लसफ़ा
अनुभव (तजुर्बा) रहा है अपना-अपना
जीवन को कहा है किसी ने नगमा,
किसी ने कहा है इसे इक नदियां,
किसी ने माना कुछ नहीं,
किसी ने माना इक पहेली।
इत्तफ़ाक़ रखता हूँ मैं भी,
सभी फ़लसफ़ों से जुदा-जुदा
मगर दर्शन मेरा कहता है
ज़िंदगी है कुछ नहीं
है तो बस इंतज़ार जुदा-जुदा,
निचोड़ कहे तो बस-इंतज़ार – 3
कभी सुनहरा तो कभी बेसुरा इंतज़ार,
मगर इंतज़ार बस इंतज़ार
कभी बोझिल, कभी दिलकश इंतज़ार,
ज़िंदगी में ये होगा, वो होगा, सब होगा
अब होगा, तब होगा, कब होगा,
कुछ सफल कुछ असफल प्रयास,
मगर फिर भी इंतज़ार, बस इंतज़ार।
कभी बनते सपने, कभी बिगड़ते सपने,
टूटते सपने, सिमटते सपने
काकामयाब सपने नाकामयाब सपने
कभी हँसते सपने कभी बिलखते सपने
कभी तड़पते सपने तो कभी मरते सपने
कभी सुलगते सपने
क्रमशः (फ़लसफ़ा ज़िंदगी का)
कभी जलते तो कभी बुझते सपने
कभी हल्के तो कभी बोझिल सपने
कभी जागते सपने, कभी सोते सपने
कुछ सच होते सपने,
तो कभी अधूरे छूटते सपने
रोज़-रोज़ कुछ नहीं, इंतज़ार, बस इंतज़ार
सुबह हो तो रात का, रात हो तो दिन का
बचपन हो तो जवानी का,
जवानी हो तो बुढ़ापे का,
कुछ चाहते हुए कुछ न चाहते इंतज़ार
जीने का और मौत अब आए तब आए
बस मौत के आने का दुःखद सुखद इंतज़ार।
ज़िंदगी का सच, होना क्या है बुरा हश्र
जलना या होना दफ़्न
मगर होना राख या मिट्टी ये तय, सच खलता है चुभता है
लेकिन करे क्या है, जमाने का यही कड़वा सच,
जीवन का पहिया, रोकना नहीं अपने बस, उम्र का सफर,
थाम ले, नहीं किसी के बस, ज़िंदगी यूँ ही गुज़रती है, बाहों या
आहों में, कब किस घड़ी थम जाए जीवन का ये सुहाना
बेबस सफर, पहेली अबूझ कब सुलझ जाए है सब बेख़बर।