डॉक्टर कुमार विश्वास, साहित्यिक रसराज-साज
**इंजीनियरिंग… ,हिन्दी लेक्चरर,फिर कवि.अब-मानस मर्मज्ञ, Dr कुमार विश्वाश **
[* यानी जिधर भी
हाथ मारा, शख्स और शख्सियत हर जगह पौबारह !* ]
जीवन पथ पर चलते- आते हैं कई मोड़ !
कुछ मोड़ से पहले पडाव
कुछ उसमें रम जाने हैं ,
रंग जाते हैं लोग!
लेकिन कुछ अचानक मन की सुन- की बहुत हो गया इस क्षेत्र में
कुछ और अलग करने की सोचते-
या युग की लय पहचान मूड जाते हैं
और किस्मत देखे कि कामयाबी वहाँ भी चमत्कृत वृहद विशिष्ट ज्वलंत पाते हैं
लेकिन ऐसे बिरले भाग्य के धनी बहुत कम ही पाएं जाने हैं
कथा वाचन कला में महारथ
कुमार विश्वास के साथ सफलता रथ
अलग ,बहुत अलग
परम्परा से हटकर
विशेष,अति विशेष- नजर आते हैं !!
लेकिन इक बात बड़े पते की ‘सनातन nk ‘ कि -पड़ाव हो या के मोड़
जहाँ सुकून हो ठहराना चाहिए ,मुड़ना चाहिए !
कई बार पड़ाव मज़बूरी ,विवशता होती है- कई बार शौक ,लगाव
किसी मोड़ पर मुड़ने का यही आईना, यही सबब है!!!!!*
*nk सनातन
अब बात विश्वास की जो कुमार बना
इक छबीला नौजवान शर्मा जी का पुत्रं पुत्र-इक अध्यापक का पुत्र (Dr कुमार विश्वास के पिता Dr ….जो PG कॉलेज में प्रोफेसर तनख्वाह मात्र 700 से 1000 वैसे उस दौर 1970 अच्छी लेकिन दूसरी व्यवसाईक और सिविल सर्विसेज की तुलना में न्यून और सम्मान में कोरी ठीक लेकिन रुतबे में शून्य)
की दबाव पिता का पुत्र पर
की- इंजीनियर बने
और डिप्लोमा डिग्री लेने विषय थोपा गया !
ये मानसिकता आज भी
की पिताओ द्वारा पुत्र-पुत्री पर बाज़ार के भाव अनुसार विषय थोपे जाते हैं
वच्चे-बच्ची यानी संतान की क्या रुचि
अफ़सोस पिल दिए जाते हैं
ठीक यही हुआ कुमार के साथ
क्यो, कयोंकि पिता अध्यापक प्राध्यापक यानी गुरु
और गुरु यानी गरीब ,अल्प वेतन भोगी
सादकी सच्चाई का प्रतीक
कोई ऊपरी इनकम नहीं
क्योकि टेबल पर फ़ाइल नहीं
की आए ग्राहक बेचारा वक्त का मारा
की फ़ाइल पर वज़न रखे कि फ़ाइल उड़े नहीं
और दफ्तर के चक्कर न लगे
और सहज काम हो जाए!!
ये महान परंपरा हर महकमे यानी राजकीय या सार्वजनिक विभाग में बादस्तूर जारी है
और सब अफसरानों कारकुनों की लाली ही लाली है
अतएव एक समझदार पिता…
क्यों चाहेगा- कि बेटा अध्यापक बनें !!!????
अध्यापक,शिक्षक और गुरु
यूं तो पर्याय हैं एक दूसरे के
लेकिन प्रासंगिक रूप से
गुरु एक अनन्य शब्द है
और भारतीय शास्त्रों में इसकी महिमा सम्मान का वर्णन है-
की गुरु को ईश्वर से भी ऊपर का मान
लेकिन ये दर्जा , ये आदर,ये सम्मान-
सिर्फ और सिर्फ किताबो में !!!
धरातल पर इसकी स्तिथि –
अफ़सोस हक़ीकत से बहुत विषम ,विकल दूर है !
लेकिन हां कुछ सांस्कारवान शिष्य आज भी श्रीराम ,श्री कृष्ण के साए !
वो गुरुकुलीय
परम श्रद्धा, सम्मान दर्शाते हैं- अपने गुरुओं के प्रति-की होते जब नत मस्तक साक्षात दंडवत -कि चरण अघाते हैं !!
गुरु पूर्णिमा, शिक्षक दिवस गुरु सम्मान दिवस
खूब सराहे और पूजे जाते हैं !!
खेर विषय ये नहीं पर ये –
कि कुमार विश्वास
मन इंजीनियरिंग में नहीं लगता
क्योकि मन का विषय न था
था तो सिर्फ थोपा हुआ
फिर आप इंजिनीरिंग की उच्च हैसियत भरी डिग्री शिक्षा को त्यज तिलांजलि
पिता श्री की त्यौरियां चढ़ाते हैं
लेकिन मन मौजी आत्म रूखी
की हिंदी साहित्य के विद्यार्थी बन जाते हैं
और गोल्ड मैडल पाते हैं
ये कमाल तभी होता है
जब विद्यार्थी मन के संकाय विषय चुनते हैं
और अभिभावकों द्वारा थोपे नहीं जाते हैं!!
फिर अकादमिक शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री-
आप विद्या वाचस्पति यानी हिंदी चलन में कहे तो-पीएचडी (Ph. D) भी हाँसिल कर जाते हैं !
फिर आप राजकीय महाविद्यालय मे प्रोफेसर भी हो जाते हैं
वो भी हिंदी साहित्य के प्रोफेसर
हिंदी में श्रृंगार रस अनुपम विरल रसल रसज्ञ
ऐसे में कुमार संभव में पड़ जाते हैं-
की प्रदधूम्न -मायावती अनायास खिंचे चले आते
और तब कुमार का श्रृंगार आसमा लेता है
और कॉलेज कवि सम्मेलन में
नॉजवां पीढ़ी की दुखती धड़कती नब्ज पर हाथ
की कोई दीवाना कहता है ,कोई पागल समझता है
उपझता है
और विश्वास कुमार के साथ रातों रात छा जाता है !!
और कविताओं में चिकनी चुपड़ी नैतिक आसमान की बाते करने वाला
कवि समाज ईर्ष्या से जल भून जाता है
आलोचना का तांता अम्बार लग
जाता है
की ये कोई काफिया है रदीफ़ है सब गड़बड़
तब फ़िल्म पड़ोसन का गीत याद आता है
की एक चतुर नार करके सिंगार
कई भटक जाता है
शास्त्रीय शास्त्रीयता में फीका फ्री स्टाइल किशोर दा छा जाता है
यानी गीत संगीत जो भी हो
वही जो जनता तक अवाम तक पहुँचे
और देखते ही देखते कुमार विश्वास देश का सिरमौर साहित्य सरताज कवि बन जाता है !!
लेकिन ये इतना आसान न था-
अध्यापन रास नही आता
और सेवा यानी नोकरी से त्यागपत्र
-लोगों ने पागल कहा,
परिवार वालों ने भी लताड़ा –
कि नोकरी वो भी कॉलेज प्रोफेसर की
बामुश्किल मिलती है
और बंदा होशो हवास में रिजाइन करता है
लेकिन कुमार का विश्वास और निर्णय अटल-
पिता जी ने पूछा क्या करेगा
कहा कविता करूँगा
पिता ने कहां अरे कविता एक साइड जॉब है
आजीविका के लिए अस्थाई नोकरी ज़रूरी
लेकिन कुमार अपने निर्णय पर अडिग रहे
और फुल फ्लैश कविता करने लगे
हालांकि बहुत हाथ पैर मारे
क्योकि कोई भी किसी को सहज आगे आने नही देता
कवि समाज प्रकाश का आइना भी नही दूध का धोया
इसके लिए गिराके आगे बढ़ने का रिवाज़ है
आखिर कुमार ने एक कॉलेज जलसे में प्रेम की कविता गाई
कविता ऐसी
की हर पलक की झपक बन गयी
आंखों में जो सूरत थी प्रेम की झलक अगन तपन बन गयी
हर जवा रूह में ये रूहानी पंक्तियां
कि मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था
कभी मीरा दीवानी है
और कुमार में विश्वास जगाने बनाने की अद्भुत कला कौशल
की श्रृंगार के साथ सब क्षेत्र
की जहाँ से भी हास्य निकले निकाले
और सभी प्रकार के श्रोता
चाहे किसी बात से मंत्रमुग्ध हो जाए
दर्शकों श्रोताओं को जोड़ने की अद्भुत कला
की बंदा नॉजवाँ दिलो में छा गया रम गया-
गीत ,कविता -कोई दीवाना कहता है,
कोई पागल समझता है-
वाह ! जवाँ धड़कनों में ये गूंजने लगा
और हर कोई दीवाना बनता चला गया
और कुमार विश्वास ने कई कवियों की दुकानें बन्द कर दी !
और युग था मोबाइल का
हर किसी के पास मोबाइल
और मोबाइल टोन का क्रेज
और कुमार के उस प्रेम गीत को
वाह एक करोड़ लोगों ने रात ओ रात डाउन लोड किया-
रिंग टोन डाउन लोड मुफ्त न था
सशुल्क था
और कुमार विश्वास रातो रात करोड़ पति
ओर देश का स्टार कवि बन गया !!
और वो भी हाईएस्ट फी पेड
औऱ इस मंचीय कवियों के सम्राट ने
वाह कई कवियों को पोषित किया
पोषित यानी कुमार को सुनने आते श्रोता
उन छूट भइयो को भी झेलना पड़ा
और सुना सालाना बीस लाख इन्कम टैक्स है भरता
लेकिन अचानक लय बदली रुख बदला
राजनीति बनी फंदा
की अमेठी मे हार
फिर उससे किनारा
लेकिन कविता व्यापार तो ज्यो का त्यों तो क्या
उससे भी बढ़-चढ़ चला !!
की अब क्षेत्र बदला
लेकिन जनता की आसक्ति उससे भी भारी
और भक्ति बाज़ार में भी भाव लाखो में
ये कोई विरला पुरुष उसके बहुमुखी चहुमुखी प्रतिभा व्यक्तित्व की कहानी है
की कभी वाल्मीकि फिर तुलसी सने राम छवि में
फिर सने रामानंद सागर घर घर मे
अब रमा रहे कुमार विश्वास रामलला के पुण्य समर में
कभी वेदव्यास मुखर महाभारत वेद उपनिषद लेकर
बीआर चोपड़ा ने भी पिरोया कालजयी प्रखर स्तर पर
कुमार भी साधेंगे ये सब विषय अपनी मुखर वाणी और विद्वत साकी में
कि वो अब मानस मर्मज्ञ बन गए हैं
हाँ कुमार विश्वास राम मई हो गए हैं
यहां भी कई कथा वाचको को पीछे छोड़ दिया !!
उनका धंधा चौपड़ कर दिया है
जैसे कभी आशाराम बापू ने किया कथा वाचक
फिर कृण्ण अवतार महा संत बन कर
बन्दे ने राजनीति भी जॉइन कि
लेकिन रास नहीं आई
हालांकि उसका कद बहुत बड़ा औऱ राष्ट्रीय
कि खुद कोई राजदल बना लेता
देश को एक साफ सुथरा नैतिक नेता फिर सरकार मिलता
लेकिन वो केजरी से जुड़ा
जिसने मौका भुनाया
यदि कुमार भी सियासत खेलता
भेडियो वाली की मारे शेर और खाए शिकार वो रंगा सियार और झुंड
लेकिन क्योकि बन्दा कवि था
चारण भाट नहीं था कि राजा की झूठ मुठ प्रशंसा करे
और भेट मे जमीदारी ले ले
ये मौलिक कवि था बेबाक कवि था
दिन को दिन और रात को
रात कहने वाला
निडर कवि
कोई चाटूकारिता नहीं, कोई पुरस्कार की चाह नहीं
कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं
कोई भीरुता नही
बस बेबाक
जो ही वातावरण में जो ही सियासत सामाजिक प्रकति में
बस अटूट विनोदी विद्वत संमा बाधने में
औऱ कविता लाजवाब
कंठ मधुर की रस ही रस टपके
की सारे साज फीके
किसी बीट ,म्यूजिक की ज़रूरत नहीं
और हर बोल की बोल वाह
मन छूअन दर्शन से भरपूर !!
आजकल आध्यात्मिक सभाओं का सरताज
कि रामायण को आधुनिक प्रसंगों से जोड़ना
और ज्ञान के साथ श्रोताओं को अनुरंजित करना
कि भक्त- अभक्त पब्लिक श्रोता झूम उठे !
वाह कुमार हम भी धन्य की तेरे समकालीन तेरे युग मे सुने पढ़े !!
💐💐☺️💐💐
*nk सनातन