~ Welcome to the Literary World of NK Sanatan (Naresh Kumar Sevak) ~

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NK Sanatan's Writing Treasure

A Treasure of Thoughts, Poems & Prose
Written Since 1990

Naresh Kumar Sevak (NK Sanatan)
“Some books are to be tasted, others to be swallowed, and some few to be chewed and digested.” – Sir Francis Bacon

भौतिक दिली टुकड़े

भौतिक दिली टुकड़े

भौतिक टुकड़े
पत्थरों के शहर में मैं भी निर्जीव हो गया हूँ
अब कोई कैसी भी छेनी मुझ पर बेअसर है !
*nk सनातन

पत्थरों के शहर में मैं भी निर्जीव हो गया हूँ
अब कोई कैसी भी छेनी मुझ पर बेअसर है !
*nk सनातन

नक्काश जो खुद मुर्दा हैं
लेकिन संजीवता की चाह रखते हैं
नक़्क़ाशी कितनी भी दिलकश हो बोलती तब है जब आप जिन्ददादिली से उसे निहारते हैं !
*nk सनातन

★ पत्थरों के शहर में मैं भी निर्जीव हो गया हूँ
अब कोई कैसी भी छेनी मुझ पर बेअसर है !
*nk सनातन

★ नक्काश जो खुद मुर्दा
हैं अफ़सोस संजीवता की चाह रखते हैं
कोई कैसे देखे सजीव होकर उनकी कृति को जो भुतहा दिल रखते हैं !
*nk सनातन

नक़्क़ाशी कितनी भी दिलकश हो बोलती तभी है-2
जब देखनेवाला खुद ,खुद हो यानी जिन्ददादिली से उसे निहारता हैं !
*nk सनातन

नक्काश क्यो बेदर्द बेरहम है
हथौड़ा-छेनी प्रहार पर प्रहार
कभी जोर से कभी होले से
ओर इस मार से तराशा ये पत्थर बहुरंग
की देखते ही दर्शक को लगे कि
की ये बोलती तस्वीरें-
कलाकृतियां
ये अब बोलेंगी तब बोलेंगी
लेकिन व्यवहारिक जीवन मे ये–2
ये दस्तूर ये रिवाज़ रास नहीं आती !
*nk सनातन