अब वक़्त है कम (Now Time is Short)

अब वक़्त है कम (Now Time is Short)

यूँ तो ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं,
मगर उम्र के जिस पड़ाव पर हैं भाई,
कह सकते है गुज़री है अब तक जितनी,
मान लो नहीं है ज्यादा मेरे भाई,
इस पड़ाव पर शुरुआत हो नहीं सकती,
हां समझौता ही सम्भव और है सही,
अगर चाहते, रही कटे भली,
उम्र का नाजुक मोड़ है नहीं चंगी,
मगर कट जाये खुद के बल यही अर्ज़ी,
मर्ज़ यहाँ ढेरों, नहीं चलती अपनी मर्जी,
लेकिन रस्सी जली मगर बल की अब भी चर्बी,
राख हो गये लेकिन सोच में अब भी गर्मी,
चाहे कुछ कह लो मान लो,
अब तक काटी उसकी पौनी भी न रही
उम्र का ये दौर आशंकित आतंकित है।
कब किस वक़्त जाने सांसे रह जाय थमी।
अब तलक दौरे मिलना जुड़ना था,
अपने से अपनों में बसना था,
अब दौर-ए-बिछड़ना है।
ना जाने कब कोई समाचार आ जाए।
की वो दुनिया में अब नहीं रहे,
और शामिल होना है अंतिम यात्रा में।
क्रमशः (अब वक़्त)
अपनों के जनाज़े देखना,
पाक सफर में कांधे देना,
घड़ी दो घड़ी ग़म ज़दा,
अफ़सोस अदा करना ही रस्में करनी है अदा,
कुछ ख़ास अपनों पे,
आँसू भी बहना है,
कुछ पर आँसू बहाना है।
दिल तोड़ने वाली घड़ियों को,
देखना है सहना है।
कुल मिलाकर अब,
समय गिनती का है,
खुद विदा होने से पहले
अपनों को शुभचिंतकों को
परिचितों को, पड़ोसियों को,
सहकर्मियों को, मित्रों को,
रिश्तेनाती नाते दारों को,
बिछड़ते देखना है।
जितना जियो ज्यादा टूटते रहना है।
अपनो को जाते देखना है बस अपनो – अपनों को।

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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