“चलो आज फिर असभ्य बन जायें !!”
सभ्यता का दावा हम करते दम भरते चोंगा ओढ़ते
बरसो से हर बार जबकि सभ्यता के नाम
कई कई असभ्य हमारे काम
पहले पेट के लिए मारते थे
अब शौक के लिए मारते हैं
चलो अब त्याग दे ये सभ्यता
आओ अपना ले फिर असभ्यता
तो शायद आ जाय फिर असल में सभ्यता
अब मारे हम फिर से सिर्फ पेट के ही लिए
लेकिन विकल्प हैं तो नज़रंदाज़ क्यों न करे
मारना ही तो जंगली पन मारे
कपडे पहन कर भी हम नंगे
भाषा भाषी हो कर भी अभाषी
धर्म रख कर भी हम अधर्मी
सभ्य हो कर क्यों बर्बर
घर होकर भी हम बेघर
सामाजिक होकर भी असामाजिक
हर मोड़ हर पहलु में आर्थिकता ही आर्थिकता
धार्मिक होकर भी ठेठ अधार्मिक
चलो “सनातन” आज फिर
अह ये झूठी सभ्यता का चोंगा उतार फ़ेके
और असभ्य ही हो ले फिर
सभ्यता का विलोम असभ्य
हां अब सभ्यता का पर्याय लगता है
चलो असभ्य हो शब्द कोष में
हां ये जायज संशोधन कर जाए
असल में हकीकत स्वीकार
हां मानव नही आदम ही बन
सभ्यता के इल्जाम से बच जाए ।।
**nk sevak “sanatan”