मेरा घर (My Home – A Stage Comedy Poem)

मेरा घर (My Home – A Stage Comedy Poem)

मेरा घर (मंचीय हास्य कविता)
घर कैसा भी हो अपना – अपना हैं,
है नहीं मेरा घर, बनाना सबका सपना हैं।
बीबी कैसी भी हो दूसरों की, देखके सुकूँ मिलता हैं,
लेकिन घर का क्या – दूसरों का देख, सुकूँ कहां मिलता है।
हँलाकि दोनों में है देखना सीफ़ (सिर्फ़),
पर देखने और देखने, दोनों में ज़मीं आस्मां का फ़र्क़ होता है।
उसको देखने पर बात अन्दर तक चली जाती है।
और किसी रात सपनों में पूरी चली जाती है।
कभी नहीं हो पूरी तो खुद की बीबी को ही,
कोई लैला समझ उस आनंद को पाता हैं।
लेकिन घर – घर का क्या,
दूसरों का समझूँ भी तो उसमें कहां रह पाता हूँ।
घर अपना शरण स्थली है,
दिन के काम-धाम क्षोभ व्यायाम,
थकान, उथलपुथल से जब घर जाता हूँ,
अपने घर में स्वर्ग सा सुकूँ पाता हूँ।
जो सारे इंतजामातों से सजे-भरे पड़े है,
लेकिन उसमें सुख मीलता (मिलता) है पर क्षणिक
क्योंकि उसमें पराये पन का एहसास जो होता है।
बीबी दूसरे की हो तो भी क्या बात है प्रकृति में ही
हां बस अपना सा सुहाना सा एहसास होता है।
है ये इक PHD या रिसर्च का विषय,
कोई शोधार्थी चाहे तो आनंद पा सकता है।
क्रमशः (मेरा घर)
भारतीय पत्नियों से अगर पति के बारे में पूछा जाए तो,
वो बताना तो बहुत चाहती है पर मजबूरी है।
संस्कृति भारतीय परम्परा जो ऐसी है,
हां अंतरंग सखी – सहेलियों से सब चर्चा करती हैं।
कुछ ऊपर की कुछ अन्दर की,
बड़े चाव से बयां करती है।
और अरे यार तेरे वो और मेरे वो,
में क्या खूब हँसी ठिठोली होती है।
किसी की बीबी ईर्ष्या का विषय नहीं होता,
लेकिन घर ज़रूर ईर्ष्या का विषय होता है।
क्योंकि सब बिबियों (बीवियों) का ऊपरी फ़्रेम अलग हो सकता,
बाकी ढांचा अन्दर बाहर सब एक जैसा हँसी।
वैसे भी स्त्री के बारे में दर्शन मनोविज्ञान सर्व विदित,
चेहरे ऊपर रूमाल डालो सब वैजयंतीमाला,
पर घर के ढांचे अंदरूनी बाहरी,
अलग-अलग होते है। डाले कैसे रूमाल उसपर।
और कैसे समझ ले आशिया मेरा मधुबाला।

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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