■ राज में राज ! ■
【 एक काल्पनिक कहानी 】
एक पिता जो बहुत बड़े ओहदे से रिटायर्ड हैं के तीन पुत्र हैं- नवल,धवल,कमल ।
तीनो बड़े होनहार ओर बड़ी राजकीय पोस्ट पर आसीन जिसमें अग्रज नवल एक कम्मिशनर हैं मंझला धवल लेक्चर है तीसरा कमल फाइनेंस अफसर है । इनमें मंझले जो अपने निवास से महज डेढ़ किलोमीटर एक उच्च माध्यमिक विद्यालय में लेक्चर के पद से प्राचार्य पद पर प्रोमोशन होता है लेकिन पदस्थापन शहर से 60 किलोमीटर दूर होता है। चूंकि प्राचार्य पद पर प्रोमोशन से पूर्व शहर में ही पोस्टेड वह भी शहर की नामचीन स्कूल में कार्यरत जो निवास से महज डेढ़ किलोमीटर तो 60 किलोमीटर का मलाल तो रहता है । अब प्रोमोशन की प्रक्रिया में शुरू में जहां विकल्प दिए जाते हैं उनमें से एक चुनना विवशता होती है ओर उसने कोई सेटिंग के अवसर न के बराबर होते हैं ! तो 60 KM वाला स्थान सबसे नजदीक ओर उपयुक्त था। बस मंझला भाई यानी धवल रोज सर्विस पर जा रहा था । मन मे चाह तो थी कि यार दूर है थोड़ा नज़दीक आ जाये तो ठीक। लेकिन अभी कोई तोड़ नहीं था। सो नियति स्वीकार कर मन- बेमन जो भी कहे सेवा जारी थी। मंझले भाई जो हाई प्रोफाइल या प्रतिष्ठित पद पर जो अनुज की व्यथा से पूरी तरह वाकिफ़ ओर उस भाई ने तोड़ ढूंढा । सिफारिश काम नही आई क्योकि राजनीति और लालफीताशाही में सिर्फ धन या मोटा पैसा सबसे बड़ा रुतबा ओर घुस सबसे बड़ी ओर सहज सुविधा जिससे सब नियम शून्य हो जाते हैं। लालफीताशाही ओर् सियासत में कोई किसी का रिश्तेदार नहीं होता ओर् सभी अवसरवादी होते हैं और बहती गंगा में हाथ धोना उनका शौक होता है। लेकिन पहले रुतबे का इस्तेमाल किया लेकिन कोई जोड़ नहीं निकला। तब एक PA जो उन्ही के आईएएस कैडर का निकल आया लेकिन शिक्षा मंत्री से बात की तो उन्होंने 20 लाख रुपये सुविधा शुल्क बताया बीच शहर की नामचीन स्कूल में पद स्थापन के एवज में
! फिर क्या था अग्रज ने 20 लाख दे दिए और अगले दिन भाई के मोबाइल पर PDF यानी गवर्नमेंट आर्डर शहर की उसी स्कूल में जहां आप लेक्चर थे प्राचार्य के रूप में ट्रांसफर आर्डर। शहर के शिक्षा निदेशक का भी पर्सनल फोन की आप कल जॉइन करे।इससे पूर्व वहां के निवर्तमान प्राचार्य को आगाह की आपका ट्रांसफर फ़ला जगह ओर कल ही जॉइन करना है क्योकि एक बंदा वहां कल जॉइन कर रहा है । और एक विकल्प है आपके पास यदि आप वही बने रहना चाहते हैं तो 25 लाख शिक्षा मंत्री जी को पहुंचा दे क्योकि जो बंदा कल जॉइन कर रहा है उसने 20 लाख पहुँचा दिए हैं ! पढ़ते ही वर्तमान प्राचार्य के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए !
इधर मंझला भाई यानी धवल आर्डर देख हतप्रभ रह गया कि ये चमत्कार कैसे हुवा ? उस प्राचार्य को कह दिया था कि 20 लाख वाला सत्य किसी से साझा न करे वरना परिणाम भुगतना पड़ेगा।
अब धवल बड़े धर्मसंकट में की वह वहां कैसे जॉइन करे क्योकि वहां कार्यरत प्राचार्य उनका प्राचार्य भी रहा और मित्रवत भी! अब वो करें तो क्या करे ,कहे तो किस से कहे ! सारा स्टाफ खुश था इस खबर से सिवाय प्राचार्य के ! अब वह यानि धवल बड़े धर्मसंकट में! हालांकि उस प्राचार्य का ट्रांसफर शहर से 15 KM ही दूर हुवा था। लेकिन स्कूल रुतबे वाला नहीं था और इतनी बड़ी प्रतिष्ठित जगह से वहां जाना एक तरह का अपमान और अहम को ठेस पहुचाने वाला था फिर उस महत्वपूर्ण जगह पर बैठने के लिए रिश्वत की दैवीय सुविधा का उपयोग किया था ओर रकम 5 लाख दी थी। हालांकि 3 साल के कार्यकाल में आपने बड़ी ईमानदारी निभाते हुवे तिकड़म बैठा राशि वसूल कर दी थी बस ब्याज वसूलना बाकी था हालांकि वह भी क्रियान्वयन प्रक्रिया में था ! धवल ने पता करने की कोशिश की सभी सूत्रों से की ये चमत्कार कैसे हुवा ,नाकाम रहा ! आखिर उसने सोचा कि ये तो भगवान की मर्जी हुई दिखे क्योकि वह बड़ा ईमानदार और चरित्रवान व्यक्ति है इसलिए मात्र तीन माह में वह मनपसंद ओर रुतबे वाली जगह पर आ गया । उसके अग्रज यानी नवल ने भी ये राज नही खोला और सहज ही रहा कि उसे कुछ पता ही नही। मिस्टर एक्स प्राचार्य को पता कि 20 लाख रुपैये रिश्वत के बल पर ये मिस्टर धवल यहां आया है लेकिन उसे चुप रहने की सख्त हिदायत है। और इतनी बड़ी राशि ट्रांसफर के लिए देना वहां रहने के एवज में ओर वह भी प्राचार्य पद के लिए जिसमे घुस,रिश्वत ओर अतिरिक्त आय के साधन स्त्रोत सीमित है और हैं तो बड़ा जुगाड़ जमाना पड़ता है लेकिन 25 लाख वसूलना वहां रेटिरमेंट तक भी सम्भव नही है! हां थोड़ा अनैतिक होकर हज़ार दस हज़ार खा सकते हैं अतः वही 15 किलोमीटर दूर जॉइन करना मुनासिब समझा। आप किसी भी राजनीतिक दल के हो या पक्षधर हो जहां धन काम करता है सिफारिश ओर सारे रिश्ते-नाते शून्य हो जाते हैं ! और रिश्वत में भी होंडा- होडी होती है, बोली होती है जो ज्यादा बोलेगा तराजू उसी ओर झुकेगा !
इस तरह मिस्टर धवल ने ज्वाइन कर लिया लेकिन हुवे चमत्कार पर उसे भरोसा नही हो रहा था! लेकिन ज्यादा नही सोच कर आम खाओ गुठलियां क्यो गिने वाले सिद्धांत को आत्मसात कर सहज होता गया। उसे पता नहीं कि उसके अग्रज नवल ने इतनी बड़ी राशि दे कर उसे उस जगह बैठाया है जहां उसकी तमन्ना थी और परिवार की जरूरत भी। 20 लाख राशि आप कम्मिशनर भाई नवल के लिए नगण्य थी। लोहा लोहे को काटता है और आप उस महकमे में थे जहां रिश्वत ,घुस नही ली जाती वहां उसे प्रसाद ,देवभोग ,भेंट, उपहार,ईनाम आदि सम्मानिय शब्दो से नवाज़ा जाता है। बड़े -बड़े धन्ना सेठ देश को कर या टेक्स का चूना लगा कर करोड़ो बचा लेते हैं और उसके बदले रसूख लोग ऑफ़सरशाही को लाखों में भेंट दे कर खुश कर देते हैं। ओर ईश्वर को भेंट चढ़ाना ,प्रसाद चढ़ाना एक तरह की रिश्वत ही तो है ! और वैसे भी जो लोग ईमान -धर्म से टेक्स चुकाते हैं उसका सरकारें कितना, किस ईमानदारी से उपयोग ,सदुपयोग, दुरुपयोग करते हैं ये सवालों के घेरे में ओर इस तरह पूरा सिस्टम ही इस महान सिस्टम से मजे में है !
खेर आप मिस्टर धवल भली-भांति ईमानदारी से सेवा करते हैं इस तरह आठ वर्ष की उनकी सेवा अदत्त थी पूरी होकर सुखद रूप से रिटायर हो जाते हैं । रिटायरमेंट की पार्टी में उनके अग्रज नवल जी भी जो तीन वर्ष पूर्व रिटायर्ड हो चुके थे भी उपस्थित थे। पार्टी में दो शब्दों के लिए उन्हें भी मंच पर आमंत्रित किया जाता है, विद्वान थे,एक कवि , लेखक ओर समाजसेवी भी थे सो उनका उद्बोधन बहुत समृद्ध और दर्शन से लबरेज था। आप अपने उद्बोधन में उस राज का पर्दाफाश करते हैं कि उन्होंने अपने अनुज धवल के इस जगह के स्थानांतरण के लिए 20 लाख कैश का पुलिंदा तत्कालीन शिक्षामंत्री जी को पहुचाया ओर तत्काल प्रभाव से उनके अनुज धवल का ट्रांसफर आर्डर रिलीज कर दिया गया। इसमे उनका भी स्वार्थ था, इतनी बड़ी राशि उनके लिए कोई मायने नही रखती थी क्योकि उनका वेतन ही 5 लाख से ऊपर था ओर सब तरह से ईश्वर की मेहरबानी थी ओर परिवार के बंध के लिए पैसा मायने नही रखता। शेयर मार्केट में भी बहुत सफल विनियोग चल रहा था। ये राज जानकर अनुज श्री नवल भौचक रह जाते हैं कि कोई भाई इतनी बड़ी राशि अपने भाई के ट्रांसफर के लिए दे सकता है। उन्होंने कहा हमारे माता-पिता 70 प्लस थे और तीन भाइयों में मंझले नवल ओर उनका परिवार ही उनके पास थे और प्रोमोशन में 60 किलोमीटर की दूरी असहनीय थी। जेक या सिफारिश लगाई लेकिन प्रभाव में नहीं आई तब उनके अनुसार मांगी गई बड़ी राशि चुका ट्रांसफर करवाया। और मेरे अनुज धवल ने इन सात सालों में शहर में ही रह कर माता-पिता और हमारे परिवार का हर तरह से बहुत खयाल रखा। हम दो भाई बड़ी दूर दूर पोस्टेड थे ।एक दौर में पैसा मायने नहीं रखता व्यक्ति की बड़ी कीमत होती है। आपने पढ़ा एक दम्पत्ति के दो बेटे,दोनो अमेरिका बड़े रुतबे ओर धनपति। ओर उम्रदराज माता-पिता भारत मे । नोकर हैं, चाकर हैं लेकिन न बेटे न बहुऐ न पोता-पोती। ओर नोकर नोकर होते हैं ! ओर खून का रिश्ता ओर पुत्र-पुत्री की बात और होती है। और उस केस में बॉप मर जाता है लावारिस की तरह,माँ मर जाती है अनाथ की तरह। अतः मेरा वो फैसला माता-पिता और परिवार के लिए था जिसके आगे धन गौण था। इस उद्बोधन के बाद मिस्टर एक्स प्राचार्य भी दो वचन के तहत ये राज खोलते हैं कि उन्हें वो राज पता था लेकिन मुझे पाबद्ध किया गया था कि मैं इस राज को राज रखु ! इस तरह संशय सुख और कृतज्ञता में बदल जाता है और आयोजित दावत का आनंद नाच-गाना के साथ लिया जाता है। ईश्वर ऐसे महान भाई सबको दे । हालांकि दुनियादारी में ये उदाहरण शून्य हैं। देखा गया है कि एक बॉप के चार बैठे जो उस मृत बॉप की लाश उठाये जा रहे हैं और लड़ते-लड़ते जमीन पर पटक देते हैं कि लाश तभी श्मशान पहुचेगी जब बॉप कि संपति का सही-सही बटवारा अभी इसी वक्त हो ! खेर ये घटना दैवीय घटना है जो सदियों में एक बार घटती है। वैसे “द ट्रीब्यूट ” नाम की कहानी जिसके लेखक महोदय का नाम दास बहादुर उर्फ जितेंद्र नारायण दास है एक बेहद आत्मिक ओर मनछुअन कहानी है जिसके मुख्य किरदार मंझले भाई बाबुली की है जो इक विद्वान के बतौर प्रोफेसर की सेवा में हैं दूर महानगर में । जो अपनी पैतृक संपत्ति अपने बड़े भाई के नाम कर वापस शहर चले जाते हैं जबकि उनकी पत्नी उसके खिलाफ थी। बाबुली के मन मस्तिष्क में उसके बड़े भाई के महान त्याग और भ्रातृत्व प्रेम जो बचपन मे उसने देखे उभरते हैं और वह धिक्कारते हैं कि शहर में जाकर माँ और बड़े भाई को भूल गया वह कितना स्वार्थी है आदि..! बाबुली का महान चरित्र यू उभर के आता है और पाठकों का दिल जीत लेता है! मेरे इस फिक्शन या कपोल कल्पित कहानी के जरिये बाबुली की महान कहानी की याद यकायक उभर आई। मैं खुश किस्मत हूँ कि ये कहानी ” द ट्रीब्यूट” को आंग्ल भाषा मे पढ़ने जा सौभाग्य स्कूली दिनों में पढ़ने का मौका मिला ! एक बार फिर महान काल्पनिक विषयपरक कहानी के कहानीकार को नमन।
*nk सनातन