न संतोष न आनंद अब फिर भी संतोष आनंद!

न संतोष न आनंद अब फिर भी संतोष आनंद!

न संतोष न आनंद अब फिर भी संतोषानंद
जीवन इक गीत इक संगीत है
इसके कई मन मेख या के रंजो गम हैं
कभी बसंत कभी मल्हार कभी सावन के मीत है
संग कभी संगदिल कई अंगों की रीत है
संगीत इसके ऐसे सुरीले
कभी बेदम फटे बेसुरीले
बस जिंदगी यही यही इसके आईने
जुड़ने ~टूटने, जुड़ने ~ बिछड़ने की हर उम्र इसके अलग माईने
हरी पीली
नीली काली, श्वेत सुर्ख सप्तरंगी क्षितिज लाली
इंद्रधनुषी सूरज किरणाई मस्त छितराई स्वर्ग हाली
ये धरती पर आसमाई कहानी
सब कहते ठीक पर सब की अपनी रब रूबाई
किसने लिखा इसे प्यार का नगमा
कभी ये रंग कभी बेरंग आईनाईं है
लिख तो दिया जब सितारे बुलंद
कड़वे तजुर्बे बदली शायद अब वो दर्शनाई हो
यहां लालसा ऐशो आराम वैभव रसुखि पाने की
तो इतर इसके सब ऐश्वर्य छोडने की भी अजीब कविताई है
लोगो ने पूजा जी में बसाया उन महामानवों को
जिन्होंने पाया ही पाया
मगर छोड़ा या स्वतः त्यागा क्या वीरता दिखाई है
माना मसीहा महापुरुष अवतारा
श्रद्धा विश्वास अरदास पूजन उदारा
प्रति उन पुरोधा युग पुरुषाई क्या विरल तरानाई है !!
ये दुनिया समझ से परे कभी दानव कभी देवाई है !!!!
*Nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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