शिक्षा जगत में शिक्षक द्रोणाचार्य हमेंशा अंगूठा मांगते रहेंगे!
“शिक्षा जगत में शिक्षक बृहस्पति और शुक्राचार्य हमेंशा बने रहेंगे!”
●शिक्षा अब सेवा नहीं रही●
शिक्षा एक व्यवसाय नहीं है !ये इक सेवा सेवा है !
हालांकि आधुनिक युग में शिक्षा के उद्देश्य बदले हैं और शिक्षा का स्तर नैतिक एवम प्राकृतिक न होकर पूर्णरूपेण व्यावाइक एवम भौतिक दायरे में चला गया है। शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति को सुनागरिक और नैतिक रूप से सामाजिक प्राणी बनाना है लेकिन आज सामाजिक रूप से अभिभावक एवम शिक्षकों द्वारा शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी हांसिल कराना हो गया है । आज के अद्यतन दौर में व्यक्ति सिर्फ़ नौकरी प्राप्त करने के जुगाड में रहता है और अच्छी वेतन श्रृंखला द्वारा सामाजिक एवम भौतिक हैसियत या के ओकात या शुद्ध हिंदी में स्टेटस(😃😃😃) बढ़ाने की चाह में लगा रहता है । जबसे भारत में सातवां वेतन आयोग सिस्टम यानी व्यवस्था और व्यवहार में आया है;अधिकांश नौजवानों की पहली पसंद राजकीय महकमे में जाना है ! क्योंकि वेतन श्रृंखला अच्छी है, साथ ही स्थायित्व और अन्य राजकीय लाभ, फिर काम का कम बोझ एवं कार्य समय मात्र 6 से 8 घंटे और सबसे बढ़िया राजकीय अवकाश सवेतनिक उपभोग ! मल्टीनेशनल कंपनियों में हाई पैकेज वाली नौकरी है लेकिन कार्य समय 12 से 16 घंटे और वह एम्प्लॉई मशीन या रोबोट है और उसकी सामाजिक,पारिवारिक जिंदगी,निजी जीवन सिफर यानी शून्य है ।आज शिक्षा का विस्फोट है क्योंकि शिक्षा सहज और सरल हो गई है और इसके प्राप्त करने के अवसर भी समान होकर बढ़ गए है । हालाकि सहज शिक्षा शेली से गुणात्मक रूप से स्तर गिरा है। हां इससे ग्रेजुएट या स्नातक बढ़े हैं और बेराजगार भी । इसमें जनसंख्या का विस्फोट यानी जनसंख्या बेतहाशा बढ़ी है और इससे आर्थिक संतुलन चरमराया है गड़बड़ाया है और प्रतिस्पर्था बढ़ी है जिससे एक अनार सो बीमार वाली कहावत बलवती हुई है । हां सरकार ने वोकेशनल शिक्षा यानी कार्यकुशलता प्रदान करने वाली बुनियादी व्यवसाईक शिक्षा जिससे छोटे स्तर पर सार्वजनिक स्तर पर जन सुविधा के कुशल कर्मी जैसे इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर,कार्पेंटर,टेलर, बाइंडर,वाशरमेंन या ड्राइक्लाइन , पेंटर ,कुक आदि निजी पेशे से तुरंत रोजगार प्राप्त कर सकते है । देश में स्थापित ब्रिटिश शिक्षाविद मैकाले साब की शिक्षा पद्धति में भारतीय शिक्षा का समावेश कर प्रभावी शिक्षा लागू हो जो सभी के लिए कक्षा 12 वी तक पूर्ण रूप से मुफ्त हो और महाविद्यालय स्तर पर स्नातक एवम अधिस्नातक स्तर की शिक्षा भी मुक्त हो लेकिन उसमे एक निश्चित प्रतिशत लाना तय हो।
●परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता हो●
देश में शिक्षा क्षेत्र में दो तरह के परिवार को चिन्हित करना चाहूंगा- वो ये की नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा या कम्पीटिशन खुले मैंदान में हो और छात्रों की उत्तरपुस्तिका सार्वजनिक रूप से मतदान या वोटो की गिनती की तरह सरेआम जांच हो और हाथो हाथ परिणाम घोषित हो जिससे नकल वगेरह हथकंडों पर नकेल स्वतः कसी जाए और भ्रष्ट तंत्र पर भी लगाम लग जाए। दूसरा अहम बिंदु लिखित परीक्षा के बाद साक्षात्कार सरे आम हो जिसके अंतर्गत प्रश्नकर्ता के प्रश्न और उम्मीदवार के उत्तर सार्वजनिक रूप से सुने जा सके हालाकि उसका कोई दायरा नहीं हो लेकिन सबको समान रूप से यानी इक ही स्तर के प्रश्न पूछे जाए और साक्षात देने वाला व्यक्ति भी साक्षतकर्ता से दस या बीस प्रश्न पूछे की वह भी कितने पानी में है
●शिक्षा मुफ्त हो मगर !●
मैने शिक्षा को मुक्त करने की बात की जिसमे नौकरी और व्यवसाय करने वाले व्यक्ति की आमदनी,तनख्वाह से इक निश्चित राशि हर माह काट कर उस पर किए खर्चे को वसूला जाया। इक और बिंदु इंगित करूंगा की शिक्षा को भी निजी हाथों में दे कर उन संस्थाओं को सौ फीसद एड या मदद कर शिक्षा को उच्च स्तर प्रदान किया जा सकता है। नौकरी में स्थायित्व खतरनाक है जिससे कार्मिक निश्चित और लापरवाह, उसका वेतन भी स्थाई न हो और काम और नियमित अपडेट नॉलेज की परीक्षा उसकी हो और उसका वेतन अधिक हो और सेवा अवधी 15 साल जिससे बेरोजगारी की समस्या पर अंकुश लग सकेगा। हर अधि स्नातक या पीजी होल्डर व्यक्ति को दो साल तक समाज सेवा अपने राज्य नही बल्कि दूसरे राज्य में देना अनिवार्य हो जिसमे उसे केवल राजकीय भत्ता मिले आवास मिले ।
छात्रों के लिए अकादमिक सत्र सिर्फ दस माह हो जिसमे शुरू के पांच माह अकादमिक और बाद के पांच माह नैतिक,सांस्कृतिक,खेलकूद,मनोरंजन वाले हो !
*Nk सेवक “सनातन”
शिक्षक दिवस के अवसर पर मेरी रची एक कविता जो सार्वभौमिक परिप्रेक्ष्य में उद्धत है–
*शिक्षक दिवस क्या कहता तुमको*
तुम शिक्षक हुवे पर ,गुरु नहीं
ये कैसी हवा ,क्यो वो पीर नहीं
शिक्षक दिवस क्या कहता तुमको,
शिष्य बदला , है शिकवा तुमको ।
जमाने को बदलने वाला ,खुद बदला है
गर सच कहें तो ,उसूलों से भटका है
व्यापार और तुम्हारे पेशे में ,फर्क नहीं क्या
ऐ शिक्षक समाज, दिल पे हाथ रख सोच जरा।
गुरु रामकृष्ण परमहंस कही खो गए हैं
विवेकानंद कैसे बने ,नरेन्द्र नरेन्द्र ही रह गए हैं
सन्दीपन -चाणक्य के सुर अब नहीं रहे हैं
भोतिक आँधी में हम ये कहाँ खो रहे हैं।
मूलशंकर,नरेंद्रनाथ, शिवाजी जैसे शिष्य अब कहां रहे हैं
सवाल ये की तुमने खुद शिष्य, ऐसे अब बनाये नहीं हैं
बाज़ारपन तुम पर हावी ,साया तुम्हारा उन पर भी हावी
सोचो दोष दे तो किसको दे–2।
गुरुपर्व गुरु शिष्य रिश्तों का पावन चरम
आर्यावर्त भारत की ये थाती -विरासत का महा अंग परम्
है चलन में अब भी ये दैविक परम्परा फख्र है
लेकिन थाह रंग में लिपि कोरी औपचारिकता , रंज है।
गौण हो गए ये पावन पर्व , गुरू शिष्य अब वो नहीं रहे हैं
अब हैं तो केवल कृपाचार्य -द्रोणाचार्य के व्यावसायिक रंग
शिक्षक छूटे कहीं ,अध्यापक हो बाजारू रंग में रंग गए हैं
रामदास, विरजानन्द अब सिर्फ किताबों में रह गए हैं।
शिक्षक नाम पर अध्यापक सब निरे वेतनभोगी
नोकरशाही में ये अब कर्मचारी ही बन के रह गए हैं
ये हालात आज के बदले शिक्षा जगत के महकमें के
ये दूषित पर्यावरण शिक्षक भी राजनेताओं से हो गए हैं।
युगदृष्टा राष्ट्र निर्माता समाज पथ प्रदर्शक हैं सवालों के घेरे में
ये चिंता नहीं चिंतन -मनन का विषय है
लेकिन करे कौन सी बिरादरी , कहो, बताओ तो सही
इस बदली हवा पर गौर करना जरूरी है।
गौर करे मगर कौन, ये ही सोच की परम धुरी है
कर्ण ,आरुणी, भीष्म से अब कहाँ वो शिष्य हैं
वीर शिवाजी ,मीरा सी शिष्य परंपरा भ्रमित है
समर्थ गुरु रामदास ,दादू -रैदास, कहाँ गुरुता की वो रीत है।
नहीं रहे अब वो राजा जनक से महाशिष्य
याज्ञवल्क्य उनके महागुरु जिनके चर्चे खूब रहे हैं
जनक से शागिर्द फिर हो,एकलव्य से परा शिष्य
याज्ञवल्क्य से हों से सच्चे गुरु जनक की परम्परा से फिर शिष्य हो।
फिर देखो क्या खूब हो ,भारत की आला तस्वीर
नालंदा तक्षशिला विक्रमशिला जी उठेंगे ,लिए फिर वो समृद्ध तासीर
लेकिन ऐसा हो मन से उठे ज्वार
ये शिक्षक दिवस यही कहता हमको ।
शिक्षक दिवस ,गुरुपर्व से पहले होते कई जुगाड़
जैसे -तैसे पा जाएं कोई छोटा- मोटा सम्मान
जिनकी ऊपर तक सेटिंग, या हो पूरी सांठगांठ ,पाते वही सम्मान
अफ़सोस ये अवदशा शिक्षण के पावन, महत्ती ढाँचे की।
सच्चे शिक्षक ठेठ बेचारे, दर किनार सिस्टम के मारे
जुगाड़ उन पर गहरा तमाचा सिस्टम मुस्कराये
वो कोसते सिस्टम को ,वो पाते बेस्ट टीचर का चमकता अवार्ड ।ये सरासर ना इंसाफी है की हज़ारों में कुछ तोले जाते।
वो भी चापलूसी- चिरौरी,सांठगांठ पहुंच का कर इस्तेमाल
जबकि अवधारणा ये की शिक्षक सभी अपने आप मे श्रेष्ठ -ज्येष्ठ हलाल
कुछ को जुगाड़ की बिला पर, वो भी अपने पैमाने तोल
कुछ नहीं है सर्व शिक्षक समाज को ताड़ना, सिस्टम की है पोल ।
इस पावन अवसर पर अपील “सनातन” की
की शिक्षकों को सम्मान ,अवार्ड की तुला से न तोले जाय
शिक्षक शिक्षक है उस पर विश्वास किया जाए
जिस गुरु पद को स्वयं भगवान जनार्दन कृष्ण ने बड़ा कहा
उस पर पूरा- पूरा एतबार किया जाय।
ओर सौ में कोई एक-दो ऐसे वैसे निकल भी जाये
यानी अपनी सेवा से न्याय न करे तो
तो उन्हें उस महामहिम सर्व शक्तिमान के न्याय पर छोड़ दिया जाय
आखिर ऊपर वाले कि लाठी में आवाज नहीं पर इंसाफ जरूर है।
सम्मान, अवार्ड शेष शिक्षकों को अपमानित कुंठित करते हैं
हाँ जो सच्चे हैं वाकई अच्छे हैं उन्हें श्रेष्ठतर आंका जाय
तो विश्वास “सनातन” किसी शिक्षक को ऐतराज न होगा
ओर वो उनसे प्रेरणा ले खुद भी राधाकृष्णन-कलाम बनने तत्तपर हो जाएगा।
शिक्षक सभी श्रेष्ठ शिष्यों को समान शिक्षा देते हैं
जो ग्रहण करे आदर्श मान विशिष्ट श्रेष्ठ बन जाते हैं
ओर जो जैसा पढ़ता है उत्तम मध्यम निम्न बनता है
ये ईश्वर के सर्वहारा संतुलन के आईना सा है।
शिक्षक तो सबको श्रेष्ठ बनाने का भरसक प्रयास करता है
लेकिन अपने मनन -अध्ययन से विद्यार्थी जुदा -जुदा बनता है
ओर ,जो अध्ययन शिक्षण को तरजीह दे गुरु मूरत को आदर्श बनाते हैं
वो अर्जुन एकलव्य ध्रुव बन जाते हैं ।
आज शिक्षक दिवस पर “सनातन” ही नहीं द्रवित
सारे भारत का आर्त्तनाद की शिक्षक हो फिर धीर गम्भीर
तो शिष्य अपने आप निखर उठेंगे
जैसे चाहे ले लो महान सिकन्दर नेपोलियन या महान मौर्य वंश संस्थापक चन्द्रगुप्त।
ओर महा उस्ताद चाणक्य, दण्डयायन ,अरस्तू ,प्लुटो
पूजे जाएंगे लेकर वहीं सनातन प्रीत रीति ।
**N K सेवक “सनात
**अनमोल विचार **
प्रजातंत्र में शिक्षा एक ऐसी प्रकुति है जो किसी भी आम आदमी की जिंदगी बदल सकती है
ओर प्रतियोगी ( Competitive ) परीक्षा के दौर में जहां बहुत प्रतिस्पर्धा है लेकिन समान अवसर है !
*nk सनातन
*विस्तृत विचार*
प्रजातंत्र में शिक्षा प्राप्ति के समान अवसर उपलब्ध हैं और शिक्षा एक ऐसी समृद्ध प्रकुति है जो किसी भी आम आदमी की जिंदगी बदल जमीन से आसमा दे सकती है और एक अनार सो बीमार के दौर में
प्रतियोगी ( Competitive ) परीक्षा का दर्पण है जहां बहुत प्रतिस्पर्धा है लेकिन समान अवसर है जो श्रेष्ठता या योग्यता सूची में स्थान बनाता है सेवा में चुन लिया जाता है !
*nk सनातन
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