■ तलब अब वो जाम ऐ शराब की ! ■
बेवफ़ा बन गयी हैं वो
दिल आजिज थी जो
दिलरूबा हमनवां हमराज थी मेरी
बहारों के दिन थे तलब सिर्फ मोहब्बत रहती थी
मिलन ही मिलन था जाने जुदाई बहुत दूर रहती थी
लेकिन समा बदला तो
अब शराब कि तलब जिंदगी की जरूरत
उसकी तरह दिल ऐ जान बन गयी है
सुकूँ वो तो नही मिलता उसकी बाहों में जन्नत जैसा ना ही होठो से होंठ का चुम्मन अमृत जैसा
के अब वो अफसानाई
नही जाम तेरे जैसा
लब से लग हलक से उतरती है किसी तरह
जाहिर है तुमसी मीठी नही ये शराब है कडवि-नुमा
लेकिन तसल्ली यही की कमबख्त नींद दे जाती है कुछ तेरी यादों में रमा के नींद दे जाती है
खेर हक़ीक़त नहीं पर तेरे सपनो में ले जाती हैं
हसीन मुलाकातें भी करवाती है फिर सुहानी बाते होती हैं
बस नींद खुलते ही बस वही तन्हा बेरुखी का आलम ओर मेरी तलब शराब बन जाती है
मोहब्बत है तो बहुत मीठी ओर कड़वी भी
जिसमे वफ़ा ओर जफ़ा दोनो के मकाम या के पड़ाव होते हैं
लेकिन शराब सिर्फ़ कड़वी ओर कड़वी
मगर नशेमन कर मोहब्बत की तरह
नही कही दूर तलक जफ़ा का नाम
वरन वफ़ा ही वफ़ा जानेमन दिलरूबा
हां खुद बनो बेवफा तो बात और है
शराब की तासिर ये की वो कभी बेवफ़ा नहीं होती
उसकी इस बात पर सारी कायनात फिदा है
वो एक नींद एक सुंकु ओर असल मेंहबूबा जिंदगी की मौत से रूबरू
कर बिना गिला शिकवे
चेन भरी अंतिम सांस दे जाती है।
*nk सेवक ”सनातन”