★ एक विराट कवि सम्मेलन लाइव : विराट कविवर ! ★
■माई फेंटेसी विथ पैरामाउंट हाइट!!!!■
एक बार एक विराट राष्ट्रीय कवि सम्मेलन…।
विराट था तो श्रोताओं का भारी जमावड़ा ।
ओर नाना प्रकार के भिन्न-भिन्न प्रदेश से कविगणों की उपस्थिति ।
जिसमे एक सबसे अधिक लब्धप्रतिष्ठ और मशहूर कवि भी तशरीफ़ रखे हुवे थे।
तभी एक हास्य रस के स्थापित कवि अवतरित हुवे कविता पाठ के लिए। सूत्रधार ने उन्हें बड़े उम्दा भाव से आमंत्रित किया ।
उनके अवतरण से दर्शक ओर श्रोता दीर्घा में तालियां गूंज उठी।
अब हास्य रस के कवि थे तो उन्होंने प्रारंभ में ही हास्य का पुट रखते हुवे तंज कसा…!
की भई तालियों के लिए ही आया था सो मिल गयी
अब काव्यपाठ की कहां आवश्यकता है !
लिफाफा यानी भेंट राशि ओन लाइन ही मिल गयी थी
ओर आयोजको-प्रायोजकों की शर्त यही थी कविवर तालियां बजनी चाहिए
तो लो बज गईं।
फिर उन्होंने पीछे बाजू में वही सबसे बड़े कवि को देखा और घूरते रहे क्योकि घूरने को कोई जनाना चेहरा मंच पर न था। और करवां चौथ का महाय पत्नी दिवस
तो श्रोताओं में सभी पुरुष
यानी सम्मेलन में शील-अशील सब परोसा जा सकता था। और सभी मर्दों को खुलकर हँसने की आजादी ! चाँद 8 बजे ही दिख चुका था और मर्द सभी नृवत्त कर के आये थे अपनी-अपनी पत्नियों को । अब श्रोता इधर-उधर नही देख सकता क्योंकि पड़ोस दोनो तरफ इकलिंगी ही था। वही हाल मंचासीन कवि गणों का । तो हर कवि सम्मेलन में सूत्रधार ओर आयोजक एक दो हँसींन चेहरे-मोहरे लाते हैं ताकि कवि बोर करे या उबाऊ लगे तो कम से कम उस बिंदु पर निहार मंत्रमुग्ध हो सकते हैं जहां से कविता अपने आप फुट रही है! तो हास्य कवि ने उन्हें घूरा ओर शुरू हुवे की आप कवि का नाम तो बहुत सुना था
लेकिन देखा नहीं था क्योंकि आप बड़े कवि हम छोटे टटपुँजिया कवि बस थोड़ा इधर उधर जोड़ तोड़ के थोड़ा मनोरंजन कर देते हैं! उन्होंने जब उन्हें देखा तो देखते ही रह गये
जब एक निगाहों से उन्हें तकते रहे
तब कवि महोदय झल्लाये
पूछा “सनातन” (हास्य कवि का तखल्लुस ) मुझे तुम यू क्यों ताक रहे हो ?
मैंने कहा –
“कविवर आप कभी प्रेमाबाद आये क्या
प्रेमाबाद लेकिन तुम तो इश्किया नगर के रहने वाले हो !
जी लेकिन प्रेमाबाद मेरा ननिहाल है !
ओर मेरे ननिहाल प्रेनबाद के शहर में चार लड़कों के चेहरे बिल्कुल आप जैसे मिलते हैं !
कविवर तपाक से बोले -नहीं
”सनातन” कविवर बोले- “इत्मीनान से गहराई में जाकर सोचे अपनी याददाश्त दूरस्त करते हुवे ओर बताए!
अब क्या था कवि पशोपेश में की झूठ बोलेंगे तो चलेगा नहीं क्योकि चेहरा मिलता है
फिर डी ऐन ऐ (DNA) की टेक्नोलॉजी हाई हो गयी है इस वैज्ञानिक दौर में,
कहीं परते खुली नारायण दत्त तिवारी जी की तरह तो मेरा भी राजफाश हो जाएगा !
तो कवि-महोदय ( रसज्ञ भूषण “कामदेव ” ) बोलें
सिर्फ 4 बार गया था !
सिर्फ 4 बार ओर एक ही शॉट में काम तमाम !
सुनते ही श्रोता दीर्घा में ठहाके…!!!!!
चलो अच्छा है उस एक शहर ही गए..! ओर शहरों में जाते तो हर शहर में आप-आप के ही चेहरे नज़र आते या
हर शहर में आपके ही अक्स होते !
कविवर (कामदेव) कौतुकी से – “अरे “सनातन” वो चारों सिर्फ चेहरे पे ही गए या मेरे मोहरे पर भी …!
नहीं कविवर ग़नीमत है वो सिर्फ चेहरे से ही आप पे गए है
वरना पूरे देश मे भूचाल आ जाता कि हर जगह आप आप के ही चेहरे नज़र आ रहे हैं ये क्या नस्ल सुधार आंदोलन चल रिया है ! और फिर चरित्र को लेकर धरने ,फिर जांच और असुमल उर्फ आशाराम..!
“कविवर कामदेव” मन ही मन- चलो भगवान का शुक्र है बच गए फजीती से!
“सनातन” -“अजी पूरा शुक्र रहा है भगवान का,
नहीं तो आप के अच्छे चरित्र पर मेरे से पहले ही अंगुली उठती ! कामदेव झेंपते हुवे -हां
सनातन-“कवि महोदय बात एक ही शॉट की है
तो बात इस जानिब ओर भी है !
वो क्या (कामदेव बोले) ?
आप जैसी सूरत का लड़का हमारे शहर में एक मछुआरे का भी है !
कविवर कामदेव-” सनातन भाई वो कैसे ?
आप जानते हैं हमारा शहर एक समुद्री किनारे बसा हुवा है !
आप कभी उस बीच ( beach ) के पर स्थित 7 स्टार में रुके थे क्या
हां ??
कामदेव- हां एक रात !
सनातन-“बस यही गलती हुई ,बाथ रूम से दो-चार बूंदे बह समुद्र में मिल गयी और उन बूंदों को मछली निगल गयी !
ओर मानो मत्स्यगंधा की तरह ये भी ठहर गयी मीन के गर्भ में !
अब मछुआरे के मछली फंसी, काटा तो उसमें एक मासूम दिखा..!
मछुआरे ने उसे पालन-पोषण किया खुद के बेटे की तरह! ओर वह भी मछलियां बेचता है !
यार ‘सनातन’ ये तो बिल्कुल ना इंसाफी है !
क्या….?
ये की सब के चेहरे ही मिलते हैं ,प्रकुति भी मिलती यानी कोई कवि बनता तो सीना ठोक के कहता हाँ ये मेरी बून्द सॉरी खून है !
“सनातन”- लेकिन कविवर ये चारों चमत्कार कैसे हुवे प्रेमाबाद वाले !?
अरे यार सनातन हुवा यूँ की वो चारों बला कि खूबसूरत ललनाएँ थी
ओर उनके घराने रूप,सौंदर्य और नर्तन को मशहूर…!
एक दिन फोन आया कि हुज़ूर …आप (कामदेव जी) बोल रहे हैं न !
मैन कहा-” जी आप कोन ?”
उसने मदहोश स्वर में कहा -मैं उर्वशी !
मैंने कहा स्वर्ग से बोल रही हो क्या ?!!
उसने कहा जनाब क्या मजाक कर रहे हैं लेकिन वादा यहां आए तो स्वर्ग की ऊर्वशी भूल जायेगे !!
उसने कहा-” मैं आपके कवि सम्मेलनों में आना चाहती हूँ ,आपको सुनना चाहती हूँ लेकिन आ नही सकती !!”
क्योंकि मैं रूप की शहजादी- मलिका…
वहशी भेड़िए मुझे नोच ले ये डर रहता है खुली जगहों पर!
मैं फूल नाज़ुक ,कमनीय काया,इसे धीरे से तोड़ना पड़ता है !
कविवर कामदेव-” ये सब तो ठीक है लेकिन मेरी फीस है कवि सम्मेलन की !”
उर्वशी- कितनी है ?
कामदेव- ” छोड़ो सुन कर तुम्हारे होश उड़ जाएंगे !”
उर्वशी-“उसने कहा बताओ तो सही !
कविवर ने कहा 20 लाख
उर्वशी ने कहा बस
आप हमारी कोठी आये
हम आपको 50 लाख देंगे
हमारे समक्ष कविता पढ़ने के !
क्या बात कर रही हैं ?!!!
लेकिन मैं 50 % एडवांस लेता हूँ !
उर्वशी- अजी छोड़ो एडवांस- वेडवांस की
आप तो गूगल पे नंबर बताए हम अभी आपके एकाउंट में पूरा अमाउंट डाल देते हैं !
ओर सुनो इकोनॉमिक्स क्लास एयर टिकिट ओर एक मेहमान की तरह 7 सितारा राजसी ठाठ सी मेहमान नवाजी भी होगी आपकी !!
ओर अगर आप हमारे व्यक्तिगत विमानपत्तन आई मीन एयर बस से आना चाहे तो आपके शहर से पिक कर हमारे महल पर बने हेलीपेड पर आपको धर देगी वहां हमारे अटेंडेंट्स आपको रिसीव कर देंगे…
!
हमारी कोठी जो समुंदर किनारे है किसी 7 सितारा होटल से कुछ ज्यादा ही है यानी 8 सितारा … ऐश ओ आराम , हर सुविधा साधन से सम्पन्न …!
फिर क्या था …
वो चार बहने एक ही शहर में..
चारो की अलग- अलग कोठियां
चार बार निमंत्रण….!
ओर धन भी मिला..!
ओर मोहब्बत भी रूहानी जिस्मानी दोनों…!
एक दिन हमने अग्रजा उर्वशी से पूछ लिया यूँ ही
की अगर हम तुम्हारे बारे में सुनते ओर आते तो क्या कीमत होती तुम्हारे आगोश की…!???
उसने कहा छोड़ो बताऊंगी तो तुम्हारी दुनिया हिल जाएगी !
फिर भी कामदेव ने भारपूर्वक पूछा …!
छोड़ो तुम्हारी औकात ही नही उर्वशी ने इतरा के कहा..!
तो भी …तो सुनो 5 करोड़ ओर वो भी एडवांस बुकिंग 1साल बाद नंबर आता है !!!!
आशिकों की कतार रहती है जनाब सालभर !!
इनकम टैक्स यानी आयकर दाता तुम भी मैं भी, ओर लाइसेन्स सुदा नर्तकी हूँ। लेकिन वो सब भी जो मर्द चाहता है..
कामदेव- तो रेड नहीं पड़ती ऐसे अनर्गल ओर अनैतिक जिस्मफरोशी से
उर्वशी- जब हम-तुम एक हुवे तो क्या रेड पड़ी,नही न,तुम साल में जितने कमाते हो उतना तो हम हफ्ता दे देते हैं अफ़सरो को ! ओर जो बांका -छबीला-रंगीला तुम्हारी तरह वो आ जाता है तो कई हफ़्तों की राशि बच जाती है।
हम तो समंदर है पानी सीधे तो पी नहीं सकते इसलिए धूप में जल भांप में बदल बादल बन मानसून का इंतज़ार कर आर्द्रता या नमी पा बरसना पड़ता है तब संचित हो जल ठहरे अच्छी तरह यानी फ़िल्टर हो तब ही पिया जा सकता है…चलो आप तो कवि हैं फिर बुद्धिजीवी भी समझ गए होंगे!
यानी तुम इनकम टैक्स में 20-30 लाख भरते होंगे
मैं 20 करोड़ टेक्स भर्ती हूँ…ओर सुनो समाज सेवा भी करती हूँ!
ओर ग़ज़ल, शेर- शायरी,कविता गीत भी लिखती हूँ शौकिया आपकी तरह मैं बाजारू-व्यवसायिक कवि समाज से नहीं… मैं जैसा कि आप कवि सम्मेलनों का ओछा ट्रेंड है कि खूबसूरत कवयित्री बुलाओ ओर छेड़छाड़ एपिसोड जो श्रोताओं को खूब भाता है.. मैं सिर्फ मंच पर खड़ी हो जाऊ तो समझो तुम्हारा मार्केट भी खत्म और घर-गृहस्थी भी!
कामदेव-नहीं, नहीं देवी ये जुल्म मत करना !
उर्वशी आगे कहती है-
ओर अपनी महफ़िल में गाती हूँ
नृत्य तो आपने देख ही लिया है रसिक ओर आशिक करोड़ो उछालते है मेरे कदमो में..मेरी खूबसूरती
इंद्र के दरबार की मेनका से कम नही है ये तुमने माना होगा ओर नृत्य भी देखा होगा कि व्यक्ति सीधा दिवान ऐ खास हाल की ही प्रार्थना करता है!
आप खुशकिस्मत है कामदेव जी कि आप पे हमारा दिल आ गया
क्योकि आप बहुत समृद्ध लेखनी के धनी हैं यानी कवि हैं और तो और सूरत -सीरत से भी ईश्वर आप पर भी मेहरबान रहा है !
*NK सनातन