गद्य बोले तो मुक्त लेखन विधा !

गद्य बोले तो मुक्त लेखन विधा !

गद्य विधा यानी मुक्त हस्त मन विधा
किसी युवक बतौर लेखक पहली बार गद्य विधा में कलम चलाई । विषय नैराश्य का दर्शन लिए हुवे था और काफ़ी आला दर्जे का लगा जब उसे पढ़ा और प्रतिक्रिया में उस लेखक को उद्दीपन दिया कि आपने बहुत समृद्ध लिखा है। लेकिन आलेख के बाद उस युवा कलमकार का प्रश्न था कि उसने गद्य विधा पर पहली बार कलम चलाई है और इसके लिए कोई नियम वगेरह हैं क्या ? मैंने बतौर एक वरिष्ठ कलमकार ये जानकारी दी कि गद्य विधा एक नदी की तरह है जो निश्च्छल होकर अपनी तरह बहती है बिना किसी रुकावट ,बंधन के ओर जहां अवरोध हो किसी तरह जगह बना ही लेती है । यानी स्पष्ट है कि गद्य विधा एक स्वछंद विधा है जो सभी शास्त्रीय धुनों से मुक्त है । हां विषय मे तारतम्यता हो,अच्छा शब्द चयन हो , व्याकरणिक वाक्य रचना हो और विषय मे लयबद्धता हो,सहजता हो। बस यही गद्य विधा है जो आसान भी है लेकिन इसकी एक ही कमी की इसे गाया नही जा सकता और पाठक को मन मे उतारने के लिए, समझने के लिए डूब के ,रुचि के साथ पढ़ा या वाचन किया जाना नितांत आवश्यक है। और इसीलिए ये गद्य है पद्य नही। पद्य विधा जटिल है और नियमो में बंधी होती है हालांकि आजकल मुक्तकंठ- मन वाली रचनाएं प्रभाव में है जैसे डॉक्टर कुमार विश्वास की सबसे प्रसिद्ध रचना -” कोई दीवाना कहता है” पर कुवैत के एक कवि-मुशायरा समागम में एक पाकिस्तानी शायर महोदय ने आपत्ति जताई कि कुमार साब इसमे काफ़िया जम नहीं रहा या दूरस्त नहीं है मीटर के हिसाब से। तब कुमार साब निरुत्तर हो गए क्योकि विशुद्ध साहित्यिक कसौटी पर वह रचना त्रुटिपूर्ण थी लेकिन तुकबंदी में लयबद्धता थी जो कुमार ने अपनी शैली में मधुर ढंग से ढाल कर गाया ओर चुकी प्रेम पर था जिसमे युवा प्रेमियों की टीस,कसक,क्षोभ सब था सो चल पड़ी और कुमार विश्वास को विश्वास दिया कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं और इसके पश्च वे देश के सबसे लब्धप्रतिष्ठ कवि बन गए यानी सुर स्टार कवि और ईनकम टेक्स देने वाले कवि ओर सबसे ज्यादा दर्शक ओर श्रोता जुटाने वाले हाई पे कवि बन गए। और जब अपनी बारी पर जब उन्होंने कविता पाठ की शुरुआत की तो उनसे पहले ही श्रोता गाने लग गए तब कुमार साब ने कहा पीछे मुड़ के की खान साब ओर काफ़िया मिलाउ क्या ! यानी जो विषयवस्तु लोगो को पसंद आये उसमें विधा ,नियम हो न हो फर्क नही पड़ता! हालांकि हिन्दुस्ताम में निरर्थक बोल ओर अर्थ वाला -“कोलावरी कोलावेरी खूब चला ” !
गद्य विस्तारात्मक प्रक्रिया है बातचीत की प्रक्रिया है जो आसानी से समझी जा सकती है । पद्य एक जटिल और पेचीदा प्रक्रिया है जो वृन्दो, छंदों,अलंकारों, समासों, संधियों ,बंदों, अनुबंधों ,तुको ,मात्राओं में झकडी होती है और जिसके भाव सिर्फ कवि ही जानता है कि उसने किस परिप्रेक्ष्य में क्या कहा है अतः कई पद्य कृतियों में भावार्थ में संशय ओर कयास हैं और सवालों में है कि सटीक कवि का क्या भाव रहा होगा । पद्य एक गायन विधा है जो समझ मे नही भी आये तो सुर श्रोता पर प्रभाव डालता है और वह डोलने लगता है । रामायण का सुंदर कांड अक्सर होता है मंदिरों-पंडालों में ओर् भक्तों ,श्रोताओं को समझ आये न आये वो मंत्रमुग्ध होकर,तल्लीन होकर सुनते हैं!
*nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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