” सफलता के पैमाने ! ”
दुनिया में हर व्यक्ति सफल होना चाहता है ! सफलता के क्या मायने हैं ? सफलता की कोई पुष्ट या सर्वमान्य परिभाषा है ? शायद नहीं, लेकिन सफलता के कई आयामों में व्यक्ति की आर्थिक सफलता को श्रेष्ठ प्रकृति माना जाता है। व्यक्ति सांसारिक ,सामाजिक ,आर्थिक ,पारिवारिक एवं स्वास्थयिक दृष्टि से सफल होना चाहता है लेकिन इन सबों में आर्थिक सफलता को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है क्योंकि सभी असफलताओं को आर्थिक ताकत पाट देती है , ढक देती है। सब मानवीय सफलताओं या प्रकृतियों पर विजय प्राप्त करने के लिए व्यक्ति आध्यात्म का सहारा लेता है, शरण में जाता है अन्यथा व्यक्ति का आध्यात्म की शरण मे जाने का कोई कारण नहीं दिखता। जो सर्व रूपेण सम्पन या सुखी या सफल है वो मोक्ष या अच्छी योनि में पुनः उत्पन्न होने परम सुख की सफलतम कामना करता है।इस्लाम के धर्मावलंबी पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते वो अलग बात है लेकिन सफलता को हर मजहब में सिर्फ ऐश्वर्य ओर धन से ही आरोहित किया गया है।हर व्यक्ति उस सार्वभौमिक अदृश्य शक्ति को अपने -अपने धर्म और आस्था के घेरे में मानता है । सिर्फ इसलिए कि उसका जीवन सरल बना रहे और विषम परिस्थितियों से दूर रहे और सफलता की अनन्य परिभाषा में वो खरा उतरे । आध्यात्म हर व्यक्ति की कमजोरी है क्योंकि व्यक्ति भीतर से डरा हुवा प्राणी हैं और ज्ञान जहां उसकी मजबूती है वहीँ कमज़ोरी भी है। जो लोग नास्तिक होने का दावा करते हैं भीतर से टूटे हुवे हैं और उनका नास्तिकवाद एक प्रकार का स्वांग है । वो ईश्वर को सिर्फ इसलिए नहीं मानते की ईश्वर है तो प्रकट क्यो नही और दुनिया मे इतना असंतुलन क्यों ? ये एक तुच्छ सवाल है और मानवीय कामजोरी का द्योतक है। वो असाधारण और तू साधारण ओर बस बात खत्म ! ईश्वर कभी नहीं कहता की मुझे मान मगर मनुष्य ही है जो अपनी असुरक्षा ओर सफलता को लेकर चिंतित होता है। कोई जानवर किसी शक्ति को नहीं मानता तब भी वो अपनी जिंदगी जीता है। किसी भी नास्तिक का दावा जूठा साबित हो जाएगा यदि
उसका नार्को टेस्ट कराया जाय। अर्थात पृथ्वी पर उत्पन्न व्यक्ति आध्यात्मिक अंश से अछूता नहीं है। उसकी नास्तिकता ही आस्तिकता का सबसे प्रबल उदाहरण है। वो लोग नास्तिक इसलिए हैं कि वो भाग्य की मेहरबानी से सफल हैं या दुर्भाग्य से असफल या असंतुष्ट हैं। जो व्यक्ति आशंकित है वही शक करता है। जिस दिन वैज्ञानिक जगत इस ब्रह्मांड में स्वयं की शक्ति से इस धरती पर उपलब्ध वस्तु से इतर खुद कोई वस्तु या नक्षत्र स्थापित कर देगा उसे नास्तिक होने का अधिकार मिल जाएगा और इस धरती पर परमसत्ता का आकल्पन समाप्त हो जाएगा। वैसे भी धरतीवासी सिर्फ और सिर्फ चमत्कार के दास हैं ! कोई कष्ट उन्हें न हो और जीवन के सारे सुख- सफलताएं उन पर बरसे इस चाह में उस आह में वह शक्ति को भजता है पूजता है , झुकता है।
बात हो रही है इस जहाँ में स्थापित सफलता का सूत्र ओर वो भी मात्र व्यावसायिक सफलता ही सफलता का पैमाना माना गया है।
लोकतंत्र में जो नेता लोकतंत्रात्मक रूप से चुन के राजा बने हैं वो भी प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष रूप से धन के कारण ही सिरमौर बने हैं चाहे वो खुद की संम्पत्ति है या दल की लेकिन तय है धन ने ही उन्हें सफल बनाया है। सफलता के निर्धारित पैमाने जो एक विशेष वर्ग ने स्थापित किये जिससे कई व्यक्ति असंतुष्ट हैं। अब देखे लोकतंत्र में धन के बल आप किसी भी लोकतांत्रिक पद प्राप्त कर सकते हैं बस आपको किसी धन बल वाली पार्टी का सहारा मिल जाये । और सत्तासीन होते ही बहुत पढ़े-लिखे भी हाथ बांध खड़े होते हैं क्योकि वो संवैधानिक रूप से आपका, आपके राष्ट्र का प्रमुख हैं और उसके निर्णय आपकीं सफलता और असफलता के कारक बनते हैं और महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इस कड़ी में बुद्धि बल पीछे हाथ किये खड़े रहता है इस कड़ी में बीरबल सिर्फ एक मंत्री और अपढ़ अकबर सम्राट का उदाहरण पुष्ट है।बस इसी कारण सफलता के ये पैमाने-धनबल, शारीरिक बल,बौद्धिक बल में धन बल को ज्यादा श्रेयष्कर माना है और सत्ताएं भी उनके आगे झुकतीे हैं।
सफलता के जो पैमाने समाज ने स्थापित कर रखे हैं यदि सूक्ष्मता से आंकलन करें तो सभी सफलताओं को दरकिनार कर या धत्ता बता कर सिर्फ और सिर्फ आर्थिक सफलता ही सर्वोपरि मानी जाती है।और इस फेहरिस्त में अन्य सभी सफलताएं शून्य या गौण हो जाती हैं। आर्थिक सफलता इतनी शक्तिशाली है कि ये स्वतः ही सारी असफलताएं पाट देती हैं, छुपा देती है।
लेकिन आर्थिक सफलता सिर्फ एक आंकलन है जो सर्वमान्य नहीं है पर सर्वमान्य है। इस मूल्यांकन में चाटुकारों ,शक्ति के आगे घुटने टेकने वालो और धन द्वारा शक्ति को वश कर शक्तिशाली को निर्बल करने वाली कमज़ोर कड़ियां जिम्मेदार रही और आज ये व्यवसायिक आईना ही समाज का मुखड़ा बन गया है जो पारदर्शी नही है और यही समाज की विडंबना है क्योंकि धन से ही सारे बल हासिल किए जाते हैं। क्योंकि सिर्फ मेहनत से ही व्यक्ति मजबूत और स्वस्थ होता तो किसान 100 के पार ही मरता लेकिन ऐसा नहीं है।इस विश्व समाज मे दोहरे चेहरे, दोहरे चरित्र वाले दोहरी- दोगली मानसिकता वाले लोगों की भरमार है अतः व्यावसायिक सफलता श्रेष्ठ मानी गयी है जिसे दुनिया सलाम करती है। बस यही कारण महत्ती रहा कि व्यावसायिक सफलता पर सब ने मोहर लगा रखी है। आप देखे जो रजवाड़े या राजघराने अब भी आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं आज भी उनका वही रुतबा , वही इज्जत हॉसिल है लेकिन जो
आर्थिक या व्यावसायिक रूप से उखड़ गए हैं कमजोर पड़ गए हैं उनका वो सम्मान नही रह गया है।जो लोग व्यावसायिक सफलता की खिलाफत करते हैं उनका कोई वजूद नहीं ओर है भी तो उनका स्वर इतना मद्धिम है कि सुनाई नही देता और सुनाई भी दे तो लोग सुनना नहीं जाता।
इस कड़ी में सफलता के पैमाने समय-समय पर बदलते रहते हैं और सूक्ष्मता से देखा जाय तो कई परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न व सफल हैं लेकिन पारिवारिक रूप से क्षुब्ध हैं ,विषाद में हैं जैसे तात्कालिक पुष्ट हिंदुजा और पुत्र विवाद, ठीक उसी तरह कालांतर में अम्बानी भाइयों का संपत्ति विवाद। हालांकि हल हो चुका है लेकिन अन्तःकरण में क्षोभ निवसित अवश्य होगा।कई शख्स अपनी सफलता बरकरार रखने के लिए ज़हमत उठाते हैं जो सूखद नहीं कहा जा सकता। आज उन व्यवसायिक रूप से सफल व्यक्तियों को धन की चाह नहीं लेकिन वो दुःखी इसलिए हैं कि वो अन्य की तरह प्रशंसक संख्या से कोसों दूर हैं अतः सफल होकर भी असफलता की मानसिकता से ग्रसित हैं।ये विडंबना है कि असफल व्यक्ति सफलता के लिए संघर्षरत हैं लेकिन आज जो व्यावसायिक रूप से सफल हैं के मायने बदल गए हैं।
सफलता के पैमानों को ठीक से आंका जाय तो आज बॉलीवुड हॉलीवुड खेल जगत राजनीतिक क्षेत्र और अन्य कई क्षेत्रों में व्यक्ति सफल हैं लेकिन व्यावसायिक सफलता से इतर वह अन्य प्रकृतियों या क्षेत्रोँ में असफल हैं। और वे सफल मगर असफल इस दुनिया से विदा हुवे हैं। निष्कर्ष यह कि व्यावसायिक सफलता सफलता के पैमानों में ज्येष्ठ है लेकिन अंतिम सत्य नहीं जिस पर इस भौतिक रूप से लालायित संसार ने मोहर लगा रखी है।
बाबा ,साधु ,संत ,मोला ,फ़क़ीर, पादरी, भिक्षु ,मुनि सभी सिर्फ और सिर्फ़ व्यावसायिक रूप से कितने सफल हैं एक सोच बन गया है आधुनिक युग ओर अद्यतन समाज मे। अंततः कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकता। हाँ ! व्यक्ति समाज ने अपने पैमानों में इसे ढाल सफलता -असफलता के आयाम तय किये हैं लेकिन स्पष्ट है वक्त ओर स्तिथि के अनुसार सफलता के सूत्र ओर पैमाने बदलते रहते हैं लेकिन कुल मिलाकर सफलता की परतें बहुत पतली ओर महीन होती हैं।
*written by
नरेश कुमार सेवक “सनातन”
उदयपुर(राजस्थान)
अघ्यापक
गुरुनानक पब्लिक sr sec स्कूल/एडुकेशन संस्थान जिसमे 3300 छात्र -छात्रा ओर 300 का स्टाफ ओर 500 के लगभग संस्थान सदस्य, उदयपुर।
*काव्यांगन साहित्यिक संस्था
का संस्थापक हूँ जिसमे 300 मेंबर्स हैं।
*चयन समिति से गुजारिश है कि यदि इस आर्टिकल में गुंजाइश हो तो प्रकाशन हेतु जगह देकर कॄतज्ञ करें।
****** घोषणा****
मै शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि ये मेरी मौलिक सोच एवम रचना है।