घर कैसा भी हो अपना – अपना हैं,
है नहीं मेरा घर, बनाना सबका सपना हैं।
बीबी कैसी भी हो दूसरों की, देखके सुकूँ मिलता हैं,
लेकिन घर का क्या – दूसरों का देख, सुकूँ कहां मिलता है।
हालाँकि दोनों में है देखना सिर्फ़,
पर देखने और देखने, दोनों में ज़मीं आस्मां का फ़र्क़ होता है।
घर अपना शरण स्थली है,
दिन के काम-धाम क्षोभ व्यायाम,
थकान, उथलपुथल से जब घर जाता हूँ,
अपने घर में स्वर्ग सा सुकूँ पाता हूँ।
किसी की बीबी ईर्ष्या का विषय नहीं होता,
लेकिन घर ज़रूर ईर्ष्या का विषय होता है।
क्योंकि सब बीवियों का ऊपरी फ़्रेम अलग हो सकता,
बाकी ढांचा अन्दर बाहर सब एक जैसा है।
पर घर के ढांचे अंदरूनी बाहरी,
अलग-अलग होते है।
और कैसे समझ लूँ आशियाँ मेरा मधुबाला।
— नरेश कुमार ^सनातन*