कृष्ण~सुदामा अमर मैत्री गाथा

कृष्ण~सुदामा अमर मैत्री गाथा

“कृष्ण~सुदामा अमर मैत्री गाथा”

हरी मन्नारायण नारायण नारायण
सुदामा चले अनमन लिए
उलाहने सुन सुन पत्नी प्रिए,
पहुंचे ज्यों त्यो हजार कोस चलके,
देखा हरकाए की द्वारिका आ गया है के द्वारिका आ गया है
की मेरे श्याम सखा का धाम आ गया है,पहुंचे महल के मुख्यप्रहरी दरवाजे,और कहे~
की अरे द्वारपालों मैं हूं सुदामा
तुम्हारे मालिक का सहपाठी जाना
मेरा प्रयोजन मिलना है उनसे
जाने दो मुझको भीतर महल में
कै मैं चाहता हूं भेट उनसे
के जो हैं मालिक हम तुम सबके

के देख जो हुलिया द्वारपाल बिफरे
के कहते क्या ये मजाक हमसे
देख ज़रा तू ये फटेहाल तेरे
कौन मानेगा है तू द्वारकाधीश के घेरे

क्या ओकात तेरी अरे फटीचर
जो तु करता राजन से यारी याचन खरेखर

गरीब विपन्नन छिन्न भिखारी के जैसे
काहे छलावा तुम हम से करते

लाचार सुदामा द्वारपाल से बोले
नही नही नही मत मजाक उड़ाओ
तुम वस्त्रों पे न जाओ
मेरी आह को जानो
तन से नहीं तुम मन से पहचानो
आया हू बहुत दूर गोकुल जनपद से

फटेहाल मैं हूं वक्त का मारा
भरोसा करो तुम मैं आदमी हूं सादा
रसूख ही मिले राज अधिराज से
कहां लिखा है ये कहां के है न्याये
मुझे कुछ न चाहिए कन्हैया तुम्हारे
सिर्फ इक भेट की चाह लड़ी है
की मुझे मिलना है उनसे
की सारे बचपन की याद पड़ी है

सुन सुदामा की आहे
प्रहरी जो थे पिघले पिघयाते
और जाकर द्वारकाधीश को हाल बतलाते
की प्रभु इक तन जघा न पगा पद में
हाल बुरा इक दरीदर जैसे
द्वार अड़ा है
कहता मिलना किशन से
कहता श्री कृष्ण मेरे बाल साथी
और पूछने पर नाम बतावर सुदामा कन्हैया रागी

सुन वचन द्वारपाले
कृष्ण भागे हुवे मतवाले
गले लगाकर आंसू बहाए
की पूछते सुदामा मित्र इतने बरस कहे नही आए

लेके महल में सिहासन बेठाए
धोने को चरण थाल मंगाए
क्षीर जल से पहले नयन से धार बहाए
के मित्र सुदामा के पैर नैन नीर से ही धूल जाए

देख अपने किसान को रुक्मणि भरमाए
की इतना आदर जाने कौन ये महंगा मेहमान की किशन चरमराए

की इतना कितना मेहमान महंगा की मोहन हमरे हमे भी भुलाए

हाल भाभी के पूछ के पुछत क्या भेट लिए हमारे भिजवाए
थे सत्तू इक पोटली में जो संकोचन सुदामा छुपाए

तब कृष्ण देख पोटलीया और छीने खाए
उस सत्तू में स्वर्ग से भी ज्यादा स्वाद वो पाएं

इक मुठ्ठी दो मुठ्ठी तब रुक्मणि उन्हे रोक रोकाए
की दो लोक तुमने सखा पर लुटाए
क्या तीसरा भी दे देंगे
अगर मुट्ठी तीसरी जो खाएं
हमारे लिए क्या तब बचेगा मोहन जी
कुछ हमरे जीने इक लोक तो बचाए

सुदामा देख स्वागत सखावर किसन का प्रेम प्रेगराग गजब का किसन का
की सुधबुध खोए
बचपन की यादों में खोए
भूल गए प्रयोजन की भेजा था घरवाली ने भला कुछ न मांगे बहुत सकुचाए
कुछ दिन ठहरते
किसान बड़ी मन मनुहार करते
अब इक दिन आई विरहा की सुइयां
विदा कृष्ण करते सुदामा को दिल से
पहुंचते गोकुल
न पाते झोपड़ मढिया अपने
सामने खड़ा था स्वर्ण महल आला
की ढूंढे कुटिया मन घबराए
सामने खड़ी थी सज संवर के
हीरे मोती सोने से लड़ के
मंद मंद मुस्काती बढ़ी सुदामा के
बोली ओ स्वामिराज मेरे
ये जो विचलन ये जो अचंभा
है सब माया तुम्हारे किसन से

मैं महारानी नहीं तुम्हारी भार्या जोगन
धन्य उपकार तुम्हारे किसन के
वो हंसे पर सुदामा न पहचाने

तब सुदामा सुध बुध संभाले
और सखा श्याम की समझ में आए

की किसान तुम यहां भी छलिया
जाते समय खाली हाथ लोटाए
की पढ़ लिया मन अपने बचपन सखा का
वाह मित्र क्या खूब दोस्ती निभाई
यूं दोस्ती सांसारिक लेकिन अमर अमराई
इतिहास गूंजेगा अपनी यारी से
की हर कोई चाहेगा ओ कृष्ण
सखा हो तुमसे
सखा हो तुमसे

*Nk सनातन
“कृष्ण~सुदामा अमर मैत्री गाथा”

एमअरे द्वारपालों मैं हूं सुदामा
तुम्हारे मालिक का सहपाठी जाना
मेरा प्रयोजन मिलना है उनसे
जाने दो मुझको भीतर महल में
कै मैं चाहता हूं भेट उनसे
के जो हैं मालिक हम तुम सबके

के देख जो हुलिया द्वारपाल बिफरे
के कहते क्या ये मजाक हमसे
देख ज़रा तू ये फटेहाल तेरे
कौन मानेगा है तू द्वारकाधीश के घेरे

क्या ओकात तेरी अरे फटीचर
जो तु करता राजन से यारी याचन खरेखर

गरीब विपन्नन छिन्न भिखारी के जैसे
काहे छलावा तुम हम से करते

लाचार सुदामा द्वारपाल से बोले
नही नही नही मत मजाक उड़ाओ
तुम वस्त्रों पे न जाओ
मेरी आह को जानो
तन से नहीं तुम मन से पहचानो
आया हू बहुत दूर गोकुल जनपद से

फटेहाल मैं हूं वक्त का मारा
भरोसा करो तुम मैं आदमी हूं सादा
रसूख ही मिले राज अधिराज से
कहां लिखा है ये कहां के है न्याये
मुझे कुछ न चाहिए कन्हैया तुम्हारे
सिर्फ इक भेट की चाह लड़ी है
की मुझे मिलना है उनसे
की सारे बचपन की याद पड़ी है

सुन सुदामा की आहे
प्रहरी जो थे पिघले पिघयाते
और जाकर द्वारकाधीश को हाल बतलाते
की प्रभु इक तन जघा न पगा पद में
हाल बुरा इक दरीदर जैसे
द्वार अड़ा है
कहता मिलना किशन से
कहता श्री कृष्ण मेरे बाल साथी
और पूछने पर नाम बतावर सुदामा कन्हैया रागी

सुन वचन द्वारपाले
कृष्ण भागे हुवे मतवाले
गले लगाकर आंसू बहाए
की पूछते सुदामा मित्र इतने बरस कहे नही आए

लेके महल में सिहासन बेठाए
धोने को चरण थाल मंगाए
क्षीर जल से पहले नयन से धार बहाए
के मित्र सुदामा के पैर नैन नीर से ही धूल जाए

देख अपने किसान को रुक्मणि भरमाए
की इतना आदर जाने कौन ये महंगा मेहमान की किशन चरमराए

की इतना कितना मेहमान महंगा की मोहन हमरे हमे भी भुलाए

हाल भाभी के पूछ के पुछत क्या भेट लिए हमारे भिजवाए
थे सत्तू इक पोटली में जो संकोचन सुदामा छुपाए

तब कृष्ण देख पोटलीया और छीने खाए
उस सत्तू में स्वर्ग से भी ज्यादा स्वाद वो पाएं

इक मुठ्ठी दो मुठ्ठी तब रुक्मणि उन्हे रोक रोकाए
की दो लोक तुमने सखा पर लुटाए
क्या तीसरा भी दे देंगे
अगर मुट्ठी तीसरी जो खाएं
हमारे लिए क्या तब बचेगा मोहन जी
कुछ हमरे जीने इक लोक तो बचाए

सुदामा देख स्वागत सखावर किसन का प्रेम प्रेगराग गजब का किसन का
की सुधबुध खोए
बचपन की यादों में खोए
भूल गए प्रयोजन की भेजा था घरवाली ने भला कुछ न मांगे बहुत सकुचाए
कुछ दिन ठहरते
किसान बड़ी मन मनुहार करते
अब इक दिन आई विरहा की सुइयां
विदा कृष्ण करते सुदामा को दिल से
पहुंचते गोकुल
न पाते झोपड़ मढिया अपने
सामने खड़ा था स्वर्ण महल आला
की ढूंढे कुटिया मन घबराए
सामने खड़ी थी सज संवर के
हीरे मोती सोने से लड़ के
मंद मंद मुस्काती बढ़ी सुदामा के
बोली ओ स्वामिराज मेरे
ये जो विचलन ये जो अचंभा
है सब माया तुम्हारे किसन से

मैं महारानी नहीं तुम्हारी भार्या जोगन
धन्य उपकार तुम्हारे किसन के
वो हंसे पर सुदामा न पहचाने

तब सुदामा सुध बुध संभाले
और सखा श्याम की समझ में आए

की किसान तुम यहां भी छलिया
जाते समय खाली हाथ लोटाए
की पढ़ लिया मन अपने बचपन सखा का
वाह मित्र क्या खूब दोस्ती निभाई
यूं दोस्ती सांसारिक लेकिन अमर अमराई
इतिहास गूंजेगा अपनी यारी से
की हर कोई चाहेगा ओ कृष्ण
सखा हो तुमसे
सखा हो तुमसे
*Nk सनातन

बिखरी पुष्पम पंखुरिया

फूलो को हम तोड़ते नही चुन चुन के चुनते हैं ;
और मुरझाने से पहले उन्हे गुलकंद बना लेते है !
*Nk सनातन

गुलकंद खाने का नहीं रसना में रमा ने को होता हैं ;
की सारे तालुव्य स्वादेंद्रियो के साथ तर हो जाए
जायके का आसमा होता है !
*Nk सनातन
तुम पुरुष हों मयखाने जाकर मुझे भूलाने की कोशिश करते हो
मैं कोमलांगना स्त्री शालीन चरित्र से जुड़ी
वहां जा नहीं सकती
फिर महिला सशक्तिकरण के नाम योरोप की तरह
मयखाना घर बुलाकर देखा
कमबख्त नशे में तुम और और मुसल्लसल बहुत याद आते हो !!
फिर खयाल दुरस्त हुआ तुम वहां मुझे भूलाने नहीं बहुत याद आऊ इसलिए जाते हो !
*Nk सनातन
हम पेड़ है अर्थियों ,जनाजो को जाते देखते हैं
अब न मालूम किनकी पीढ़ियों को जलाने काम आयेंगे जब ठूठ बन जायेंगे
या काट कर सुखा दिए जाकर ताबूत या के कोफिन बनाए जायेंगे !
*Nk सनातन

*स्वतंत्रता का ज्वार*
{*स्व रचित सर्वाधिकार सुरक्षित *}

जब तारीख 15 अगस्त की आती है ,
मन आंगन में तरंग छेड़ जाती है !!
आजाद है हम खुशियां जहान
इक अखंड हम भारतदेवा,
भावना दिल गहराती है !!
तारीख 15 अगस्त…….

बढ़े चले हम कदम मिलाते ,
आसमा रंग बिखराती है ।
हम देश जनों का ये गौरव पथ ,
गाथा वो अजब उमड़ आती है !
तारीख 15 अगस्त…..

आज का दिन अमर है थाती ,
रहे अटूट हम भारत वासी ~2
खुद ब खुद अपने आप ही ,
कमर कस जाती है !!
तारीख 15 अगस्त……

कोई देखे बुरी नजर हमरे वतन,
हरगिज गवारा नहीं ,
भोहें हम सब की तन जाती है !!
तारीख 15 अगस्त……

दुश्मन को सबक सिखा,
सीमाऐ लहर लहर मुस्काती हैं!!
तिरंगा जब फहरता है,
टैगोर साज जब गूंजता है!!
विश्व भारती छा जाती है,
भारत धरा के जयकारे ,
सुभाष भगत आजाद के न्यारे !!
तिलक,गांधी ,गोखले ,
राज गुरु सुखदेव उधम,
मंगल अशफाक,
रामखुदी मतवाले,
संघर्ष देश बलिदान की,
रीत अमिट भर जाती है !!
तारीख 15 अगस्त……

देखता हूं जहां तहां चारों तरफ ,
आसमा है भारत , हम विहग आजाद परिंदे !!
मन स्फुरित् , तन संचरित, आभा उमंग
दिख जाती है !!
तारीख 15 अगस्त…

लाल किले से मुखरित सारे ,
विधान मंडल के रज रखवाले,
हर शाला और दर दफ्तर,
खुशियों की लहर चल जाती है!!
देखते ही देखते खुशियां जहान चढ़ जाती हैं !!
हां जब तारीख 15 अगस्त की आती है,
ये बहुत कुछ सिखला जाती है !!

इक है हम भारतवासी,
हिंदुस्ता कहते मीर इकबाल सिकंदर,
हिंदी है हम, हिंद गुलिस्ता
है ,
ये धरती वतन सूरमाओं का
आत्मा धन्य धन, तरो ताजा हो आती है !!
तारीख 15 अगस्त की….

गीत हमारा, गान हमारा,
वंदे भारत राग हमारा,
जन गण मन भाग्य विधाता,
तिरंगा ऊंचा ,फहर फहरा, शान जगा जाती है!!
तारीख जब 15 अगस्त की आती है,
मन मुदित शोभित कर जाती है !!
ऐकता का पाठ पढ़ाती,
महंगे बलिदानों को ,
याद कराती,
धड़कन धड़कन बलिहारी, हो जाती है !!
तारीख 15 अगस्त की…

आजाद हम ,आजादी बहुत कीमती,
पाई हमने ,कई बलि वेदी पर,
हरदम रखेंगे ,मर मिटेंगे,
भूल जो ,हम राज रजवाड़ों ने की !!
कभी ना अब हम
दोहराएगे
भाई चारा, विश्व शांति,
स्वर्णिम भारत !!
आजाद हमेशा,अविचल हम रहेंगे,
दुश्मन को दोस्त बनाएंगे,
जहर से नही, गुड से मारेंगे !
खुद को खुद से, उन्हे लजाएंगे
हम अमर शांति के, दूत पुरातन
वसुधेव कुटुंबकम, हमारा परम वेद वाक्यम्न,
धरती ये चमन, नीर तरुवर ,
फल फूल लहराएंगे,
पंछी हम भारताकाश के,
हर दम चह चहाएंगे,
गीत कोयल से गायेंगे,
सबको अपना बनायेगे,
तारीख 15 अगस्त की आती है,
खुशियां संग छा जाती हैं,

हम है सच्चे ,अच्छे भारतवासी,
लोहा जगत मनवायेंगे,
गर्वित हम ,संगठित हम,
देश हित ,आगे आएंगे,

सारा विश्व हो भारतीयम, हम ऐसी फिज़ा लायेंगे,
शांति ,ऐकता, विकास, समृद्धि,
हर युग की मांग,
विवेकानंद ,दयानंद, दंडायन ,अलख हम वेदी जगाएंगे !!!!

*जय हिंद*
*Nk सनातन

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Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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