**तस्वीर अखबार की कुछ ऐसी !**
अख़बार में छपने का अपना ही मझा है
जो छपता है फुला नहीं समाता कहते नहीं अघाता
की वो फ्रंट पेज पर या फ़ला पेज पर छपा है
वाह क्या नसीब की बात है अख़बार में छपना
कुछ घण्टा आंखों का तारा यानी स्वर्ग
पढ़ लिया बाद इसके वो अखबार का हर पन्ना
कोई पकोड़े का हिस्सा बनता तो किसी को नाली नसीब
ओर किसी को भंगार वाले कि रद्दी का हिस्सा
फिर उसे पिलना है और रिसायकल हो पुनर्जन्म पाना है इस तरह वह अमिट अमर है
कहने को नष्ट है लेकिन नष्ट में भी वो मस्त है
फिर आंखों में सजने के लिए ओर फिर रद्दी बनने के लिए
अब छपने वाले फक्र करे या करे अफसोस कि
कोई कुत्ता-गाय-सुवर मल -मुत
कोई मारे भूख के खा-निगल रहा है।
लेकिन कुछ भी हो इतना कोई कोन कैसे सोचे
ऐसा सो सोचे संकीर्ण होवे तो जीना दूभर
क्योकि पानी कितना ही हो किया फ़िल्टर
जहां से आता है जो जलचर हैं और अन्य का मल-मूत्र होता ही है और दुनिया मे ऐसा कोई संयंत्र नहीं कि उस की मिलावट को दूर कर दे
अंश जरूर दौर कर दे लेकिन वो उसमे मिला है
ओर घुला है कभी अपनी उसी की तरह
इस सत्य को दूर करना किसी के बस का नहीं
ये भाव है गहन इसे समझना महा दर्शन का विषय
ठीक इसी तरह लाशों को जलाया या गलाया जाता है
लेकिन वह राख या मिट्टी में अमर है
हां इस धरती के अस्तित्व तक
अख़बार की भी जहां वालो यही
विशद कहानी
*NK सेवक ” सनातन”