शपथ किसको जरूरी और कितनी बार ?

शपथ किसको जरूरी और कितनी बार ?

#शपथ और उसका औचित्य#
शपथ यानी कसम और कसम इक विश्वास से ज्यादा खौफ,भय और देखा जाए आधुनिक सोच की दृष्टि से तो इक अंधविश्वास…अब जो धार्मिक आध्यात्मिक नैतिक आत्मिक हैं वो तो खेर कसम में विश्वास करते है या हों लेकिन एंग्लिकन सेप्टिक एथेस्ट यानी दुनिया में इक ऐसा तबका भी है जो इस श्रेणी में तो उनका क्या…!
और जो लोग शपथ लेते है अपने धर्म ग्रंथ को साक्षी या हाजिर~ नाजिर मान कर क्या वो उसका पालन करते है …जवाब नहीं में आएगा…!
हां इक 14 वर्षीय बालक तक कसम का प्रभाव दिखता है लेकिन उसमे भी कसम वापस लेने ,छोड़ने की व्यवस्था है…!
लेकिन लकीर के फकीर हम शपथ की कसम की प्रतिज्ञा की परंपरा निभाए हुवे हैं ….!
कसमें खाने ,शपथ लेने से क्या हो जायेगा और जो संविधान के प्रति वफादार ,कर्तव्यनिष्ठ रहने की कसमें खाते है क्या वो उस शपथ पर ता जीवन खरे उतरते है नहीं ! शपथ ग्रहण की रस्मे विशेष कर राज नेताओं के लिए है क्योंकि वह इक लोक सेवक होते है और सरकार और संविधान के प्रति उनकी जवाबदेही होती है और वो राजनेता देश की जनता के प्रति पूर्णरूप से अपनी कर्तव्यनिष्ठा एवम ईमानदारी से काम करे और देश की जनता के साथ न्याय करें!
अब बात संविधान दिवस की जो 26 नवंबर को मनाया जाता है । संविधान निर्मात्री सभा ने जब इसे देश के राजनेताओं को प्रस्तुत किया जिसे सर्वसम्मति से अंगीकृत किया और 26 जनवरी ,1950 को लागू किया। उस दिन संविधान की सर्वसम्मति आम जनता से नही ली गई लेकिन जो लोकनायक,देशनायक जनता के प्रतिनिधि थे की हामी सारे देश की हामी थी और उसी संविधान के अंतर्गत देश संचालित है एवम भारतीय नागरिक इसी संविधान को जन्मजात मानते हुवे अपना जीवन इक भारतीय नागरिक के रूप में जीते है!
अब संविधान दिवस हर वर्ष मनाया जाता है और लागू किया हुवा दिन ऐतिहासिक होकर गणतंत्र दिवस के रूप में प्रज्वलित है जो बड़े स्वाभिमान एवम जोश खरोश से मनाया जाता है। लेकिन संविधान दिवस के प्रति ऐसा रुझान नही क्योंकि ये गणतंत्र की तरह आम और खास रूप से प्रचलित नही है और केवल सजग और
भिज्ञ जन ही लघु रूप में इसका आयोजन कर मनाते है ।
अब कुछ लोग जो अपने आप को संविधान का प्रहरी मानते हैं और 26 नवंबर को लोगो को आमंत्रित करते हैं और प्रस्तावना पढ़ शपथ दिलवाते हैं। जाहिर है मौका भी है दस्तूर भी तो उस रोज जो भी उस प्रांगण या सभा में उपस्तिथ होता है उस पवित्र होम में अपने आप को आहूत करता है। अब सवाल ये की शपथ की जरूरत क्यों और किसके लिए….?
जाहिर है उन नागरिकों के लिए जो गैर जिम्मेदार है ,जो भ्रष्ट है, अनैतिक है ,अलोकतांत्रिक हैं,पंथ निरपेक्ष नहीं है, सहिष्णू नही है,कर्तव्यनिष्ठ नहीं हैं ,जाति और वर्ग विशेष की धारा में विश्वास रखते है, यानी संविधान के अंतर्गत खरे नहीं उतरते…! निश्चित रूप से जाहिर है सबको शपथ की जरूरत नहीं क्योंकि जब हमारे पुरखों ने इसे स्वीकारा तो जाहिर है जन्म से ही आप~हम इसे मानने उद्धत है … विवश है….तत्पर है…! क्योंकि इसमें उल्लेखित मौलिक अधिकार एवम निहित कर्तव्य जिससे इक दूसरे के अधिकारों की रक्षा होती है और देश इक सूत्र में पिरोया रहता है। और मेरी दृष्टि में यदि आप संविधान की शपथ दिलवाते है तो जाहिर है आप उन लोगो को ये करवा रहे है जो संविधान के मूल्यों के प्रति जवाब देह नहीं हैं और अनेतिकता ,भ्रष्टाचार में लिप्त है। अतः किसी को शपथ दिलवाकर
सुनागरिक नहीं बनाया जा सकता है!
विद्यालय में रोज संविधान की शपथ,देश के लिए प्रतिज्ञा और शान ,मान से राष्ट्र गान,राष्ट्र गीत गाया जाता है
लेकिन फिर भी बड़े होकर सभी सुनागरिक नहीं बनते यानी जाहिर है ये नैतिक आचरण की बात है । नेता ~राजनेता, अधिकारी,कर्मचारी सब शपथ लेते हैं लेकिन उनमें कई उस शपथ के साथ न्याय नहीं करते । काम में लापरवाही सुस्ती विलंब मानसिक भ्रष्टता में आते हैं… सो मात्र एक शपथ दिलवाकर व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं बनाया जा सकता,शपथ रस्म महज इक औपचारिकता है,ढकोसला है! इस प्रकार शपथ महज इक थोपी जाने वाली प्रथा है और मात्र इस रस्म से संविधान को बलवती नहीं बनाया जा सकता ! और संविधान वैसे ही महा बलवती है जिसके अंतर्गत न्याय पालिका ,कार्य पालिका और विधायिका कार्य करते है और हर नागरिक जो देश में रहता है सहमत हो या नही हो मानने को बाध्य है । यदि किसी कानून पर ज्यादा असहमति होती है सरकारे उसमैं संशोधन कर उस कमी को दूर करती है और करती आई है। कहते है संविधान के मूल कलेवर को नहीं बदला जा सकता जो की देश की आत्मा है लेकिन कई हुक्मरानों ने अलग~अलग देशों में संविधान बदले हैं..हमारे पड़ोसी और इक मात्र हिंदू राष्ट्र(अब नहीं)नेपाल ने पूर्णरूप से संविधान बदला गया है!
अब आप इक ऐसी सभा में जाते है जहां सब कवि या साहित्यिक समाज से है.. उसमे कुछ शिक्षक भी है या उच्च नागरिकता पद पर विराजमान शिक्षित हैं तो क्या उनको शपथ दिलवाना जायज है ….ये ठीक है की हर तबके ने सभी दूध के धोए नहीं….लेकिन इसके लिए पुख्ता पुष्टि आवश्यक है की ये अपने कर्तव्यों का निर्वाह नही करते हैं! आपने दूसरी जगह संविधान के प्रति अजवाबदेह लोग देखे हैं,
आप खुद कानूनन असुविधा एवम दोषि व्यवस्था के शिकार है ….आप खुद अप्रत्यक्ष रूप से संविधान की धज्जियां उड़ा रहें है…निजी विद्यालय में बच्चे पढाते है लेकिन वहां फीस उनके नियम से जमा कराना नहीं चाहते ! आप मनमानी फीस का आरोप लगाते है ,आप समान फीस एक्ट की मांग करते हैं… अरे भई आप अपना बच्चा मेयो कॉलेज, दून कॉलेज यानी स्कूल में करते है जो गुणात्मक एवम उच्च सुविधा एवम साधन उपलब्ध कराते हैं और कुछ स्कूल निजी लेकिन A,B,C ग्रेड सुविधा एवम शिक्षा के हिसाब से तो ऐसे में समान फीस एक्ट कैसे लागू हो सकता है! जनाब यदि आप फीस वहन नही कर पाते है तो आप अपना बच्चा निजी स्कूल में क्यों पढ़ाते है..निश्चित इसका आपके पास जवाब नही है! आप खुद ऐसा उदारण दे रहे हैं की मै फतेपुरा से सवीना तक आ रहा हूं रास्ते में मर्जी आए वहां चाय पीयू..तो भई हर टी स्टाल की क्वालिटी अलग है रुतबा सुविधा अलग है रजवाड़ी एंटरप्राइज टी स्टाल पर चाय 20 ₹ सुंदर टी स्टाल पर 10 रुपिया,चाय थड़ी पर 5 ₹ …! अतःआप इक साहित्यिक सभा में अचानक शपथ के लिए उठाते हैं और इक दिन के बाद..वो भी बिना सूचना ,बिना हस्ताक्षर, बिना पूर्व कार्यक्रम क्योंकि आप बहुत समृद्ध और पावन काम करने जा रहे थे जिसके लिए समय एवम मानसिक रूप से उत्साह तैयारी आवश्यक होती है
क्यों भई देश संविधान की बात थी !और शपथ आप वहां दिलवाते जहां जरूरत थी..है …?
यहां तो सभी नीति~ रीति और जिम्मेदार धर्म भीरू लोग हैं । और उन्हें शपथ की कहां जरूरत ।
क्योंकि जिस व्यक्ति ने जन गण मन लिखा वो उस महा समाज से हैं….जिसने वन्देमातरम गीत रचा आप उस महान बुद्धिजीवी जिम्मेदार सुनागतिक समाज से हैं यानी कवि~लेखक बिरादरी से तो क्या उन्हें किसी शपथ की जरूरत रही…. नहीं…तो फिर यहां कवि समागम में शपथ थोपना
ठीक है ! आपको प्रस्तावना पढ़नी थी पढ़ लेते ,सबको खड़ा करने वो भी अचानक बीच में प्रस्तावना और उसकी
शपथ….!
प्रस्तावना का तात्पर्य ही प्रांराभ होता है तो आप प्रारंभ में आते और आयोजक मंडल से आग्रह कर , वार्ता करते और बड़े शान से प्रारंभ में हम उसे पढ़ दोहरा बड़ी शान से शपथ लेते और गौरवन्नित होते…!
अंत में खास बात की जो वक्ता मंच पर है …कहते है की मैं धन्य हुं कवि समाज में आया हूं,मैं कवि नहीं हूं …आप कहते हैं ,”कवि मानवता के सबसे निकट होते है और मैं भी आपके बीच मानव बनने आया हूं!!!.…..
तो बंधु संविधान की शपथ जो ईश्वर के सबसे नजदीक हैं उसे क्यों दिलवाई जाय….! शपथ यदि इंसान है तो जरूरत नहीं और शैतान है तो जरूरत नही क्योंकि यदि वो ले भी लेगा शपथ तो उसकी अनुपालना नही करेगा….!
अतऐव मेरी आपत्ति संविधान शपथ की शपथ को लेकर इतनी नही जितनी समय के चुनाव की …इसके लिए बकायदा सबको एक सूचना होती की आज समारोह के प्रारंभ में या अंत में संविधान ने प्रस्तावना का वाचन होगा जिसे शपथ पूर्वक सब दोहराएंगे जिसकी पुष्टि में सभी अपने स्व हस्ताक्षर कर अनुग्रहित एवम गर्वित हो और करे..
अंत में राष्ट्र गान भी होगा….
लेकिन शपथ और संविधान का मजाक की उसे चाहे तब कसमें दिलवा दे….
तो चलों हर जगह रोज राष्ट्र गान के साथ प्रेंबल का भी वाचन शपथपुर्वक हो चाहे शादी समारोह, बफेट,पूजा,अर्चना ,
प्रार्थना व्यापारी और ग्राहक भी समान रूप से सोदेबाजी से पहले प्रेंबले की शपथ ले ! स्कूल्स में ये रस्म रोज होती है और विशेष मौके पर विशेष रूप से आयोजन द्वारा होती है।
अब बात निजी स्कूल्स फीस एक्ट की तो कहां जरूरत…! आप यदि फीस वहन नहीं कर सकते तो आप अपने बालक को राजकीय स्कूल्स में पढ़ाए जहां क्वालिफाइड टीचर्स है ,सरकार ने जरूरत की सुविधा ,किताबे फ्री,पोषण आदि भी मिडिल क्लास,फिर गार्गी पुरस्कार,साइकिल,स्कूटी,कैश इनाम,स्कॉलर शिप,फ्री हॉस्टल या आवास भोजन सुविधा,खेल आयोजन जो प्राइवेट स्कूलों में नहीं हैं! आप कहते हैं वहां पढ़ाई अच्छी नहीं होती यानी सरकार और संविधान को कोसती प्रतिक्रिया ….!
सुप्रीम कोर्ट भी ऐसा फैसला देती है की फीस एक्ट बनाया जाय लेकिन इनफ्रस्ट्रक्चर और फैसिलिटी और एजुकेशन स्तर के हिसाब से अलग अलग फीस क्राइटेरिया हो…!लेकिन आप ने बिना मुद्दे के मुद्दा बना रखा है! आप आंदोलन चलाए की कोई भी अभिभावक अपना बच्चा निजी स्कूल में नही पढ़ाए तो ये अपने आप बंद हो जायेगे फिर आंदोलन चलाए की ये इक पावन सेवा है पेशा नही निजी स्कूल कांसेप्ट खत्म हो यानी मान्यता ही न दी जाय…! अब निजी ट्रेवल्स में बैठते है यहां से हिम्मत नगर रोडवेज राजकीय बस में 250 रुपिया जबकि लग्जरी ट्रैवल में 500 और यदि अहमदाबाद उतरे तो भी 500….तो सुविधानुसार और कुछ विशेष कारण से ये निजी प्राधिकरण अपना काम करते है इन्हे किसी एक्ट में नहीं बांधा जा सकता क्योंकि आप खुद अपनी सुविधा एवम वहन क्षमता अनुसार चुनाव करते हैं।
अंत में विशेष बात संविधान premble की तो ये प्रारंभ में हो और जो सुनागरिक और कर्तव्यनिष्ठ नहीं हैं अपने कार्यों के प्रति उन्हे शपथ दिलवाई जाय और शपथ के बावजूद यदि वह अजवबदेह है तो उसे कड़ी सजा मिले…यानी साफ जाहिर है की शपथ कोई कारगर विकल्प नहीं और जिसने एक बार शपथ ले ली उसे शपथ की जरूरत नहीं क्योंकि शपथ इक बार ही अंतिम होती है..
जय भारत!
*Nk सनातन

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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