* लेखन*
लिखना व्यवसाय कतई नहीं है….
लिखना मानवार्थ नैतिक,आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक,भौगोलिक,सांस्कृतिक,वैज्ञानिक यानी सभी क्षेत्रों के उत्थान और सुखात्मक संतुष्टि के लिए है….
हां लिखने से यदि लेखक,कवि को आर्थिक लाभ हो जाय तो उसे इतनी संतुष्टि नहीं मिलती जितनी की उसे मन से डूब कर पढ़ा जाए और उसकी उन्मुक्त कंठ से सराहना प्रशंसा की जाय…!
आचार्य चाणक्य जिन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को सम्राट बनाया नंद वंश को समूल नष्ट किया और जो साम्राज्य के राज गुरु और प्रधानमंत्री…अपनी आजीविका स्वयं की लिखी किताबो से चलाते थे और उनका जीवन अत्यंत साधारण था…इक बार इक बौद्ध भिक्षु को उन्होंने खाने पर आमंत्रित किया तो भिक्षु ने सोचा शानदार 56 भोग की दावत होगी और प्रधानमंत्री का आवास सोने चांदी हीरो से जड़ित आलिशान राजप्रासाद सा होगा लेकिन भिक्षु आश्चर्यचकित
की कोई नोकर चाकर नही सिर्फ उनकी पत्नी और मां का तैयार दाल रोटी कड़ी का मेन्यू वही साधारण कपड़े का आसन जामिन पर साधारण थाली कटोरी और चाणक्य की छोटी सी कुटिया में खाना…!!!!
अतऐव निष्कर्ष यही इस ब्यौरे का की लेखन स्वांतसूखाय प्रकृति है और समाज कल्याणक कृत्य हैं इससे नैसर्गिक रूप से व्यवसायिक रूप मिल जाए और कुछ या ज्यादा धनार्जन हो जाय और कोई पारितोषिक मिल जाए तो बेहतर और नही तो भी श्रेष्ठतर….
चेतन भगत,कुमार विश्वास आज के दौर में व्यवसाईक रूप से आसमान पर हैं …उनको सलाम!!¡!
*Nk सनातन