★ महिमा गुरूपद की !★
अद्द्यापन को एक रोजगार के तहत अपनाया
ये उद्धम बना व्यवसाय बना न्यारा
ओर जब विद्यार्थियों का प्यार मिला
सम्मान मिला गुरुपद बहुत बड़ा लगा
ओर देखते ही देखते ये धर्म बना
मैंने इसे पूजा आराधना बनाया
ओर खुद को परमेश्वर के करीब पाया
पहले कहता था खुदाया क्यो शिक्षक बनाया
अब कहता है शुक्रिया ऐ परवरदिगार
की अच्छा किया क्योकि सच्चा किया
की तूने मुझे सबसे बड़ी सेवा का कामी-हामी तारणहार बनाया !
NK सेवक “सनातन”