” दशहरा पर दस नही सिर्फ इक हरें !”
दशहरे पर दस नहीं ,खुद के ही हरें,रूप अपनोने हैं जो कई धरे।
हां , सिर अपनों ने हैं जो धरे ! इसमे कितने विष -डंक भरे,
ओर मन मे डाह रखें अब डसे तब डसे,
स्वार्थों की माया में कुछ न तजें।
दुनिया बदली, समाज बदले, परम्पराये भी,
लेकिन आधुनिक रंग में भी जिंदा उनकी शान वही।
नवरात्रि हो या दशहरा जड़े वही, जान वही,
आस्था -भक्ति ,भक्तों के ज्वार वही।
ओर पाप भी वही ओर पूण्य भी वही,
भौतिक युग मे बदले पर कड़वे- मीठे सुर वही।
चाहे जलाओ, चाहे मारो,दसानन के जिन्दे तीर,
राम रहे आदर्श,पर सिद्धांतों में!
व्यवहार में वही विषैले गीत।
हर आदमी के दो- दो चेहरे, दशमुख को भी शर्माते फिर ।
बुराई पर अच्छाई की विजय, झूठ! विजयादशमी क्यों मनाए भीड़?
झूठ फरेब हत्या हिंसा- प्रतिहिंसा, बेवफाई ,क्यो रोये हीर ?
अब नही यहां कोई रांझा ,सब साधे अपने-अपने हित या पीर।
ये सब क्यों होता है, हो रहा है ?
क्योंकि बुराई जिंदा,मानवता शर्मिंदा है,
इसीलिए तो रावण जलाते हरवर्ष, प्रतिवर्ष
ले पाप के काले बिम्ब-प्रतिबिंब।
ओ भक्तोँ ,क्यों न जलादे रावण अहिरावण सदा -सदा के लिए?
फिर नही जरूरत मनाने की ये औपचारिक ,अपच रीत।
प्रतीक जला कर उपहास करें,
चरित्र-व्यक्तित्व में तनिक भी न बदलाव करें।
रावण ने सिर्फ दस धरे हमने कई कई हैं घड़े
उसके दिखते हम है छद्म छुपाये हैं बैठे।
धर्म के नाम पर अगर मनाते हैं- विजयदशमी
तो अधर्म मर जाए , रावण फिर कभी न जले ।
बस ,बस जाए श्रीराम ओर हो जाये उनके आदर्श जीत,
सब जन हम तब गाये स्नेह के मंगल गीत।
ओर बन जाये ये सारा जहां अपना मीत।
**नरेश कुमार सेवक”सनातन”
अध्यापक “गुरु नानक सीनियर सेकंडरी स्कूल ” उदयपुर, राजस्थान ।
मोबाइल नंबर-7742537602
*घोषणा”
मै सपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि ये मेरी अपनी मौलिक रचना है और अप्रकाशित है। मै “सनातन”नाम से कविताये लिखता हूँ और उदयपुर शहर में “काव्यांगन साहित्यिक संस्था ” का फाउंडर हूँ। इस संस्था में 250 से ज्यादा सदस्य हैं।
धन्यवाद।