मैं बीज गुलाब का
मैं बीज गुलाब का
जाहिर है खुशबू नहीं देता
या के महक नही देता
खुश्बू के लिए मुझे जमीन में दबाना पड़ता है
फिर खाद, पानी,धूप,हवा का प्यार लुटाना पड़ता है
फिर इंतज़ार मेरे बिजा अंकुरण का
फिर पौधा बनता हूँ
झुमता हूँ गाता हूँ
भंवरो की मधुर धुन सुनता हूँ
पराग निषेचित इधर से उधर
फिर कलियां आती है
ओर फिर फूल खिलते हैं
अब कितने दिन खिलना है
वो उस महान शक्ति के हाथ मे होता है
अब मुझे देवो पे चढ़ना है
या महापुरूषों के माथे
या उन रणबांकुरे शहीदों के सीने पे
या फिर किसी व्यक्ति के सम्मान में
या किसी महिला की वेणी या केशो में सज इतराउंगा
या किसी उत्सव ,महोत्सव,पार्टी-शॉर्टी में उछाला जाऊँगा
या किसी बारात में दूल्हे राजा के स्वागत में
महबूब के जानिब
बरसाया जाऊंगा
या फिर धूप में एक मुद्दत के बाद उमरा पूरी ओर मुरझा वसुधा पर गिर जाऊंगा
यूँ तो गिर जाऊंगा लेकिन अप्रत्यक्ष उठ जाऊंगा
क्यो क्योकि कई बीजो का वजूद है मेरे गर्भ में
लेकिन हर बिज, हर फूल पनपता है ,
एक न एक दिन बेख़ुशबू होकर मुरझाने के लिए
लेकिन वो बीज जिसमे हज़ारो मुस्काने, हज़ारो खुशबूऐ समाहित हैं
जो फिर खिलनी है इक न एक दिन
ओर मैं कायनात के अस्तित्व में देख उन्हें
स्वर्ग से सदा गर्वित होता रहूंगा !
*NK सनातन “सनातन”