बेवफ़ा वक़्त

बेवफ़ा वक़्त

काश के रंग चढ़ा के तुमने
बदस्तूर रंग बदले ना होते
दुनिया के लिए फ़िक़्र थी इतनी तुम्हे
तो बेख़ौफ़ बाहों में सिमटे न होते।

तुम्हारी नजदीकियां अगर एहसास जन्नत की,
तो दूरियां एहसास कुफ़्र-जहन्नुम, दोज़ख की,
सफ़र ज़िंदगी का धूपभरा, दूभर है,
माना मगर कहा मैं भी महान शेक्सपियर
जो तरसा एक बला काली कलूटी पर।
मैं तो महान ख़याले मिल्टन रखता हूँ।

माना तेरी खुबसूरती का रहा कायल,
लेकिन जान ए मेरे दिलनशीं मरा नहीं हूँ,
शिशा-ए-दिल उतारा तुम्हे, चाहे हूँ घायल,
ख़याले सोच में हमेशा तुझे रखा है
नर्क ही सही नर्क में भी तुझे अपना रखा है।

बेवफ़ा तुझे कहना, है तोहीन मोहब्बत की,
वो जमाने का दस्तूर था नहीं खता उसमें तेरी,
तेरी चाहों का असर सदा रहा रूहानी,
जिस्म क्या हैं ढल जाते है, मर जाते इक दिन,
इसलिए, ऐ मेरे दोस्त मेरे हमदम नाम तेरा मैंने,
हर दिल अज़ीज़ हर भावना से ऊपर,
तेरा नाम मैंने ऐ बावफ़ा ख़ुदा रक्खा है।

ख़ुदा है मिला नहीं आज तलक किसी को
फिर भी मानते है झुकते-मानते उसी को,
फिर तुम तो मिली भी मुझे
दिल के अरमान जिए तूने लिए मेरे,
हमसफ़र-हमख़याल दिलबर मेरे,
वज़ह है यही देखा मैंने तुझमें
वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक है।
जानम मेरे इसीलिए नाम तेरा,
मैंने ख़ुदा हा ख़ुदा रक्खा है।

— नरेश कुमार ^सनातन*

Naresh Kumar Sevak “Sanatan”

Poet, writer and English teacher from Udaipur, Rajasthan — M.A. in English & Hindi Literature. Writes kavita, geet, ghazal, bhajan, satire and articles in Hindi, English and Gujarati.

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