◆मुझे सब पता है !◆
लोग आम ओर खास ,सलाम मुझको करते हैं
खुश भी होता हूँ, मगरूर भी दम्भ ओर फ़क्र भी ।
लेकिन मैं जानता हूँ , सलाम लोग मुझे नही ;
हाँ मुझको नही ,मेरी सीट, मेरी रसुखि ओर मेरे ओहदे को करते हैं !
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इस चित्र ओर चिंता में चिंतन-मनन होता है ;
की लोग सलाम करते मुझे, तो पहले भी करते !
तब जब मैं किसी रुतबे -ओहदे पर न था ,
तारीफ भी करते हैं , खुशामद भी;
कुछ झूठी ही कुछ बराबर झूठी ही !
ये सीट का ही भय है जिसे गोया आदर कहते हैं जो वाकई है चिरौरी
चापलूसी !
चाटुकारों ,मक्खनबाजों,
ख़ुशामदखोरों से घेरा
जो, इससे पहले मेरे दाएं -बाएं कोई न था !
मतलब की ये दुनिया, पद का ये खेल ;
करते सलाम तो पहले भी करते !
ये अगाध स्नेह दिखाते तो पहले भी दिखाते,
सम्मान ऐसा दिखाते तो पहले भी दिखाते !
पर न था काबिल मैं पहले इतना
अब काबिलियत कहे या मौका
कुछ किस्मत कुछ ख़ुशामद
या के ऊपर वाले का इरादा , की मैं उच्च पदासीन हो गया !
मेरे चाल-चलन,व्यवहार में भी है आया बदलाव
चाहे पद का गुरुर कहे या व्यवस्था की विवशता !
अपनो से कुछ खास
ओर आम ओ से बदलाव
ये दूरियां हैं जरूरी या नहीं ,सोचता हूँ !
चिन्तन-मनन में लगा हूँ,
की पद न रहने के बाद-2
की लोग करे वाह या याद
ओर दे मोहब्बत, सम्मान !
यानी मेरे ओहदे से नही मेरे व्यक्तित्व और कृतित्व से
जो बोले बेसमय यानी पदमुक्त होने के बाद !
मैं जानता हूँ समय है कि पद है;
एक समय बाद ये पद नहीं है !
मैं किसी ओर के पद पर हूँ ;
मेरे बाद ये पद किसी ओर का होना है !
ओर जो आप नहीं है
उस पद पर,
जो कभी शोभित थे इस पद पर !
जो दम्भ,गुरुर, शान से भरे थे
कर्मचारियों को जो बड़ा औसत समझते थे !
अफ़्सोस कौन पूछता है अब
दिख जाओ तो नज़रंदाज़ बस
ओर कही निगाहे मिल गयी इत्तफाक से तो
तो हाँ औपचारिक, हृदयहीन नमस्कार सलाम !
इसलिय पद दम्भ अभिमान घमंड
सब धूमिल हो जाते हैं ;
पद जाने के वाद
एक पूछ के मोहताज हो जाते हैं !
सोचता हूँ कुछ ऐसा प्यार करू अजातशत्रु बनूँ
कुछ ऐसा सामजस्य ,
तारतम्यता, व्यवहार रखु ;
की लोग सिर्फ मुझे ही मुझे नमस्कार करें
करे सम्मान ,सलाम,अदब सत्कार केवल मुझे !!
*nk सनातन